ओपेक की आक्रामक विपणन नीतियों से निपटने के लिए भारत ने चार साल पहले तेल आयातक देशों का एक क्लब बनाने की कोशिशें शुरू की थीं। इसमें चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को शामिल करने की योजना है।
ऐसे समय में, जब रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर दुनिया आपूर्ति बाधाओं से जूझ रही है, पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) और उसके प्लस समूह देशों ने तेल उत्पादन घटाने का फैसला कर वैश्विक चिंताएं बढ़ा दी हैं। ओपेक नवंबर से उत्पादन प्रतिदिन 20 लाख बैरल घटाने वाला है। इससे कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें फिर बढऩे की आशंका है, जो पिछले चार महीने से घट रही हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण मार्च में तेल की कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। ये अब 92 डॉलर के आसपास आ चुकी हैं। कीमतों में गिरावट ही ओपेक के फैसले का प्रमुख कारण है। उसका मानना है कि बाजार के मौजूदा हालात के हिसाब से कीमतें कम हैं और उत्पादन घटने के बाद मांग बढऩे से तेल की ‘लडख़ड़ाती कीमतों’ को साधा जा सकेगा।
ओपेक देशों में सऊदी अरब का दबदबा है। अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन काफी समय से सऊदी अरब को मनाने की कोशिश कर रहे थे। बात नहीं बनी। ओपेक के प्लस समूह देशों की अगुवाई रूस करता है। इसलिए फैसले को अमरीका के लिए बड़ा झटका भी माना जा रहा है। ओपेक के फैसले के बाद इस सवाल ने फिर सिर उठाया है कि कौन-सा देश किस से तेल खरीदेगा। भारत ने साफ कर दिया है कि उसे जहां से भी तेल मिलेगा, वह खरीदेगा। केंद्रीय तेल-प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है कि भारत किसी वैश्विक दबाव में नहीं है। जनता को तेल उपलब्ध कराना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। रूस से तेल आयात को लेकर भारत पहले भी अपना रुख साफ कर चुका है। अमरीका और चीन के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। ओपेक देशों व रूस के अलावा हम ब्राजील, मैक्सिको व नाइजीरिया से भी तेल आयात करते हैं। चूंकि तेल आपूर्ति के बड़े हिस्से के लिए हम ओपेक देशों पर निर्भर हैं, इसलिए उसका कोई भी फैसला हमें सीधे तौर पर प्रभावित करता है।
ओपेक की आक्रामक विपणन नीतियों से निपटने के लिए भारत ने चार साल पहले तेल आयातक देशों का एक क्लब बनाने की कोशिशें शुरू की थीं। इसमें चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को शामिल करने की योजना है। भारत का मानना है कि तेल बेचने वाले देशों से बेहतर शर्तों पर मोल-भाव करने और तेल ब्लॉक में ओपेक देशों का दबदबा कम करने के लिए यह क्लब बेहतर मंच हो सकता है। क्लब बनाने की कोशिशों को तेज करना अब जरूरी हो गया है। अगर एशियाई देशों का यह क्लब बनता है तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। तेल खपत के मामले में भारत और चीन के ग्राफ को देखते हुए तेल निर्यातकों के लिए इस क्लब की अनदेखी आसान नहीं होगी।