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धनबल-बाहुबल की स्पर्धा में व्यस्त सत्ता के खिलाड़ी

गांधी जयंती पर राजनीति की दशा-दिशा पर भी विचार जरूरी है। गांधी साध्य ही नहीं, साधन की पवित्रता पर भी जोर देते थे, पर सत्ता केंद्रित राजनीति येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने तक सिमट गई है।

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Nitin Kumar

Oct 02, 2023

धनबल-बाहुबल की स्पर्धा में व्यस्त सत्ता के खिलाड़ी

धनबल-बाहुबल की स्पर्धा में व्यस्त सत्ता के खिलाड़ी

राज कुमार सिंह
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सत्ता के विकेंद्रीकरण के पक्षधर थे और गांव को लोकतंत्र की प्राथमिक इकाई मानते थे। उन्होंने भारत में जिस लोकतंत्र और राजनीति का सपना देखा था, सत्ता के खेल में वह पीछे छूट गया लगता है। गांधी जी साध्य ही नहीं, साधन की पवित्रता पर भी जोर देते थे, पर सत्ता केंद्रित राजनीति येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने तक सिमट गई है। गांधी जी ने लिखा है - ‘लोकतंत्र तब तक एक असंभव चीज है, जब तक कि सत्ता में सभी की हिस्सेदारी न हो... यहां तक कि एक अछूत, एक मजदूर की भी...’ पर जब हमारी राजनीति लगातार परिवारवादी व धनबल-बाहुबल केंद्रित होती गई है, तब उसमें आम आदमी की हिस्सेदारी सपना-सा लगती है। चुनाव सुधार की दिशा में सक्रिय एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच, मतदाताओं को उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों की असलियत आंकड़ों के आईने में दिखाती रहती हैं। असलियत है कि 40% सांसदों के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज हैं। ये आंकड़े नामांकन के समय दाखिल हलफनामों से लिए गए हैं। इनमें से 25% के विरुद्ध तो हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण और महिलाओं के विरुद्ध अपराध सरीखे गंभीर मामले भी हैं। राज्यसभा के 233 सदस्यों में से 225 के हलफनामों का विश्लेषण बताता है कि 12% माननीय अरबपति हैं। एक और अध्ययन बताता है कि 2009 से 2019 के बीच दोबारा चुने गए 71 लोकसभा सांसदों की संपत्ति 286% की औसत रफ्तार से बढ़ी। यह उस भारत की तस्वीर है, जिसमें करीब 80 करोड़ लोगों को सरकार हर माह पांच किलो सूखा राशन मुफ्त देती है और एक किसान की औसत दैनिक आय 27 रुपए बताई जाती है।

अब निकट भविष्य में विधानसभा चुनाव वाले पांच में से तीन राज्यों - राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के निर्वाचित प्रतिनिधियों पर भी एक नजर डाल लेते हैं। एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि 2018 में चुने गए वर्तमान राजस्थान विधानसभा के 199 में से 46 विधायकों ने स्वयं हलफनामों में अपने विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी दी थी, जबकि पिछली विधानसभा में यह संख्या 36 थी। वर्तमान विधायकों में से 28 ने अपने विरुद्ध गंभीर आपराधिक मामले भी बताए, जबकि पिछली विधानसभा में ऐसे विधायकों की संख्या 19 थी। राजस्थान के दागी विधायकों में कांग्रेस के 25, भाजपा के 12 और बसपा के 6 हैं। धनबल के दबदबे में भी राजस्थान की राजनीति पीछे नहीं है। कांग्रेस के 82 विधायक करोड़पति हैं तो भाजपा के 58 व बसपा के पांच। निरंतर महंगी होती चुनाव व्यवस्था में निर्दलीयों को भी कम मत आंकिए। राज्य के 13 में से 11 निर्दलीय विधायक करोड़पति हैं।

मध्यप्रदेश में दागी विधायक 41% हैं। यानी 94 विधायकों के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज हैं। 21% माननीयों पर तो गंभीर आपराधिक मामले हैं। अरबपति विधायकों के मामले में मध्य प्रदेश, देश में चौथे स्थान पर है। ऐसे में करोड़पति विधायकों की चर्चा ज्यादा प्रासंगिक नहीं लगती। कहना नहीं होगा कि धनबल हो या बाहुबल, सत्ता के खिलाड़ी एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते नजर आते हैं। छत्तीसगढ़ की 90 सदस्यीय विधानसभा अपेक्षाकृत छोटी है, पर धनबल में विधायकों को कम आंकना भूल होगी। विधायकों की औसत संपत्ति 10 करोड़ रुपए से ज्यादा है। हां, अरबपति अकेले टी.एस. सिंहदेव ही हैं, जिन्हें लंबे इंतजार के बाद पिछले दिनों उप मुख्यमंत्री बनाया गया। सरगुजा से विधायक सिंहदेव की संपत्ति 500 करोड़ रुपए से ज्यादा बताई गई है। सबसे गरीब विधायक भी कांग्रेस के ही हैं - चंद्रपुर से रामकुमार यादव, जिनकी संपत्ति 30,464 रुपए है। अपराधीकरण के मामले में छत्तीसगढ़ का दामन कुछ साफ नजर आता है।
इन आंकड़ों को देख कर मतदाता मतदान करेंगे तो शायद अगली बार अपने लिए बेहतर प्रतिनिधि चुन पाएंगे।