
rajasthan jaipur assembly
- गोविन्द चतुर्वेदी
आखिर जनता की जीत हुई पर आधी। आधी इसलिए कि, राज्य सरकार ने लोकसेवकों के संरक्षण के नाम पर उन्हें बचाने तथा भ्रष्ट लोकसेवकों की पहचान उजागर करने पर मीडिया को दण्डित करने का विधेयक प्रवर समिति को सौंप दिया। वह चाहती तो उसे पूरी तरह वापस भी ले सकती थी लेकिन शायद ‘नाक का सवाल’ आड़े आ गया। जनता को सरकार के इस फैसले में लोकतंत्र का सम्मान कहीं नजर नहीं आता। लोकतंत्र के प्रति दृढ़ विश्वास भी नहीं दिखता। सिर्फ एक नाटक नजर आता है जो जनता की आंखों में धूल झौंक सके।
यदि ऐसा नहीं होता तो सरकार इसी के साथ ऐसे ही उस दूसरे विधेयक को भी वापस ले लेती या प्रवर समिति को सौंप देती जो राज्य के दस संसदीय सचिवों को ९१वें संविधान संशोधन की तलवार से बचाने के लिए लाया जा रहा था। अब तक के दो सम्बन्धित कानूनों को एक करने के नाम पर सोमवार को विधानसभा में पेश इस राजस्थान विधानसभा सदस्य (निरर्हता-निवारण) विधेयक २०१७ के माध्यम से सरकार न केवल संसदीय सचिवों बल्कि ऐसे ही अन्य अनेक पदों को लाभ के दायरे से बाहर ला रही है जिन पर विधायकों को नियुक्त किया जाता है या किया जा सकता है।
ऐसे लाभ के पदों पर विधायकों की नियुक्ति पहली बार भी नहीं है और अकेले राजस्थान में भी नहीं है। राजस्थान सहित देश के अनेक राज्यों में ऐसी नियुक्तियां कांग्रेस सरकारों ने भी की हैं। दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, असम, गोवा और पश्चिमी बंगाल की ऐसी नियुक्तियों को तो वहां के उच्च न्यायालय संविधान के तथा जनहित के खिलाफ बताते हुए खारिज भी कर चुके। दिल्ली की केजरीवाल सरकार की ओर से अपने इक्कीस संसदीय सचिवों की विधायकी बचाने के लिए बनाए ऐसे ही कानून को राष्ट्रपति ने मंजूरी देने तक से मना कर दिया।
आश्चर्य की बात यह भी है कि, राजस्थान और दिल्ली के मामलों में विपक्ष में रहते हुए स्वयं भाजपा ने संसदीय सचिव बनाने का विरोध किया पर अब वही यहां उन्हें बचाने का कानून ला रही है। इससे लगता नहीं कि सरकार लोकतंत्र, न्यायपालिका और राष्ट्रपति का सम्मान करने की मंशा रखती है। उसे लगता है कि, चूंकि वह विधायकों को लाभ के दायरे से बाहर ला रही है, उनकी सदस्यता बचा रही है, ऐसे में वे तो साथ देंगे। बिल पास हो जाएगा। कानून बन जाएगा।
तब निचले सदन की सदस्यता के पन्द्रह प्रतिशत से ज्यादा को लाभ का पद भी सरकार कानूनन दे सकेगी पर क्या वह अदालत में पास होगा? फिर असल परीक्षा तो अगले साल होगी। जनता के दरबार में होगी। तब कौन बचाएगा? बेहतर हो सरकार हठ छोड़े और इस विधेयक को वापस लेकर लोकतंत्र, न्यायपालिका और राष्ट्रपति सभी का सम्मान करे।
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