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नीमचढ़े करेले

पुलिस में भर्ती के समय सबसे ज्यादा महत्व चरित्र पर दिया जाना चाहिए , पर दिया जाता है जाति, पैसे देने की क्षमता और शारीरिक बल पर।

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Bhuwanesh Jain

Jan 02, 2018

traffic police

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देश की चौपट पुलिसिंग व्यवस्था की जानकारी करनी है तो बीकानेर आइए। बीकानेर जिले की एक छोटी सी पुलिस चौकी में पुलिस जो कर रही थी, कमोबेश पूरे देश में पुलिस ऐसा ही कुछ कर रही है। इस चौकी में तैनात पुलिस कर्मी चौकी में ब्लैकमेलिंग का गिरोह चला रहे थे। वे रास्ते से किसी भलेमानुस को पकडक़र लाते। चौकी में ही एक महिला के साथ आपत्तिजनक फोटो खींचते और फिर कानूनी शिकंजे में फंसाने के नाम पर मोटी राशि वसूलते।

आज देश के किसी भी राज्य, किसी भी शहर में आम आदमी के मन में पुलिस की छवि की जानकारी कर लें। कुछ ऐसी ही छवि मिलेगी। गाली-गलौच से बात करने वालों, अपराधियों से बंधी पाने वालों, सीधे-साधे नागरिकों को लूटने और सत्ताधीशों के तलवे चाटने वालों की फौज। हर चौराहे पर पुलिसकर्मी आम लोगों से वसूली करते मिल जाएंगे। छोटे दुकानदारों, ठेले वालों से हफ्ता वसूली, वाहन चालकों से वसूली। और तो और जेलों में बंदियों को छोटी-छोटी सुविधाएं देने के लिए भी वसूली।

पुलिस की मुख्य भूमिका होती है, अपराधों पर अंकुश लगाने और अमन-शान्ति बनाए रखने में। लेकिन आज पुलिस बल में ही अपराधी तत्व और आपराधिक मानसिकता बढ़ती जा रही है। कारण यह है कि हमारे देश में पुलिस सुधार अन्तिम प्राथमिकता पर रहते हैं। पुलिस व्यवस्था राज्यों के जिम्मे है, पर राज्यों के नेतृत्व को इस पर ध्यान देने की फुर्सत ही नहीं मिलती। पुलिस में भर्ती के समय सबसे ज्यादा महत्व चरित्र पर दिया जाना चाहिए , पर दिया जाता है जाति, पैसे देने की क्षमता और शारीरिक बल पर। पुलिस प्रशिक्षण के नाम पर शारीरिक प्रशिक्षण तो दे दिया जाता है पर नौकरी करने के साथ ही उन्हें चारित्रिक पतन का प्रशिक्षण भी अपने आप मिलने लग जाता है। ऊपर से भ्रष्ट राजनेताओं का प्रश्रय भी मिल जाता है तो ज्यादातर पुलिसकर्मी नीमचढ़े करेले बन जाते हैं।

पुलिस बल में कुछ स्वच्छ छवि वाले, ईमानदार और मेहनतीकर्मी भी होते हैं, पर उनकी आवाज नक्कार खाने में तूती बन कर रह जाती है। ऐसे कर्मियों को प्राय: प्रशिक्षण कार्यालयों, फाइलों को लाने-लेजाने , वीआईपी की सुरक्षा जैसे ‘ठण्डे’ कार्यों पर लगा दिया जाता है। ‘कमाऊ’ थानों में पोस्टिंग के लिए बोलियां लगती हैं। अब इन बोलियों की रकम को जुटाने के लिए वे चौगुनी कमाई तो करेंगे ही, चाहे इसके लिए थानों और चौकियों को गिरोहों में बदलना पड़े। राजस्थान जैसे राज्य में स्थिति और भी विकट हो जाती है, जहां गृहमंत्री का पद सजावटी बना कर रखा हुआ है। अधिकारी भी उनकी सीमाएं और क्षमताएं जानते हैं।

पाप का घड़ा भर रहा है। समय रहते पुलिस सुधार पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब पुलिस में शामिल आपराधिक प्रवृत्ति के लोग घर-घर पहुंच कर उगाही करते नजर आएंगे। उस समय जो जनाक्रोश फूटेगा उसे काबू करना न आज जैसे नेताओं के वश में रहेगा और न आज जैसी पुलिस के।