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बेतरतीब निर्माण बनता है तबाही का प्रमुख कारण

भूकंप का सटीक अनुमान अभी मुश्किल है। ऐसी स्थिति में आपदा प्रबंधन पर मजबूती से कार्य करने तथा मानव जीवन को सुरक्षित रखने के उपाय पर कार्य करना आवश्यक है। असल में लोग भूकम्प की वजह से नहीं मरते, बल्कि नियमों की अनदेखी कर किए गए निर्माण एवं प्रकृति के शोषण की वजह से नुकसान ज्यादा होता है।

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Patrika Desk

Feb 22, 2023

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डॉ. शिव सिंह राठौड़
भूगर्भशास्त्री और पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष, राजस्थान लोक
सेवा आयोग

पृ थ्वी की उत्पत्ति लगभग 4.5 अरब साल पहले हुई। अनेक भूगर्भिक क्रियाओं के बाद पृथ्वी में कोर, मेंटल तथा क्रस्ट तीन सतह बन गईं। साथ ही लिथोस्फियर की टेक्टोनिक प्लेटों की स्थिति में भूगर्भिक परिवर्तन की वजह से अलग-अलग महाद्वीपों की रचना हुई। भूगर्भीय रचनाएं लगातार चलती रहीं एवं नए महाद्वीप बनते गए। समय के साथ पृथ्वी का वातावरण वनस्पति एवं व्यक्ति के लिए अनुकूल होता गया तथा अलग-अलग सभ्यताएं विकसित होने लगीं, परन्तु प्लेटों में लगातार खिसकने की भूगर्भिक क्रिया से पृथ्वी पर ज्वालामुखी, भूकम्प तथा अन्य आपदाएं आते रहने के कारण पृथ्वी पर रहने वाले प्राणियों के लिए खतरा बना रहा। इसके बावजूद मानव ने इन खतरों से कभी हार नहीं मानी।
हाल ही में 7.8 की तीव्रता के शक्तिशाली भूकम्प से तुर्की तथा सीरिया में चालीस हजार से अधिक लोग मारे गए तथा एक लाख से अधिक लोग घायल हो गए। तुर्की के भूगर्भिक रचना की वजह से यहां पूर्व में भी भूकम्प आते रहे हैं तथा अनेक बार विनाश हुआ है। तुर्की व सीरिया फॉल्ट लाइन पर बसा है। एनाटोलियन पर अरेबियन तथा अफ्रीकन प्लेट के दबाव से फॉल्ट लाइन पर भी दबाव बनने के कारण इतना तीव्र विनाशकारी भूकम्प आया। इसमें एनाटोलियन प्लेट लगभग 3 मीटर आगे खिसक गई। इस वजह से ऐसी भयानक तबाही हुई है। इसी तरह भारत में इंडियन प्लेट ऊपर की तरफ यूरेशियन प्लेट से लगातार टकरा रही है और इन प्लेटों के टकराने से हिमालय का निर्माण हुआ तथा यह टकराव अभी तक चल रहा है। इस वजह से हिमालय क्षेत्र में भूकंप की आशंका बनी रहती है। भूगर्भिक क्रियाओं के अध्ययन के आधार पर भारत को 5 भागों में बांटा गया है। जोन-1 में दक्षिण पठारी क्षेत्र है जहां भूकम्प का खतरा नहीं के बराबर है, जोन- 2 में भारत के तटीय मैदानी क्षेत्र हैं, जहां भूकम्प की गति बहुत कम होने से खतरा कम है। जोन-3 में गंगा, सिंध का मैदान, राजस्थान तथा उत्तरी गुजरात के क्षेत्र हैं, जहां भूकम्प का कुछ प्रभाव रहता है। जोन-4 में शिवालिक हिमालय के क्षेत्र, पश्चिम बंगाल का उत्तरी भाग, असम घाटी व पूर्वोत्तर भाग तथा अंडमान निकोबार का क्षेत्र है, इस क्षेत्र में अधिक खतरे की संभावना है। सबसे ज्यादा खतरे वाला जोन-5 है जिसमें कच्छ, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड का कुमाऊं क्षेत्र, सिक्किम व दार्जिलिंग का पहाड़ी क्षेत्र है, जहां अनेक विनाशकारी भूकम्प आ चुके हैं। जोन-4 व जोन-5 में बड़ी आबादी निवास करती है। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में 3.8 से 5.8 की तीव्रता के अनेक झटके लगातार महसूस किए जा रहे हैं, ये छोटे झटके बड़ी तबाही के संकेत हो सकते हैं। 7.5 से ऊपर का भूकम्प लगभग 250 किलोमीटर तक प्रभाव रखता है। यदि हिमालय क्षेत्र में 7.5 की तीव्रता से अधिक का भूकम्प आता है, तो राजधानी दिल्ली सहित आसपास के घनी आबादी के क्षेत्र में तबाही मच सकती है। फॉल्ट लाइन एक्टिव होने की वजह से भूकम्प के आने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता है।
भूकंप का सटीक अनुमान अभी मुश्किल है। ऐसी स्थिति में आपदा प्रबंधन पर मजबूती से कार्य करने तथा मानव जीवन को सुरक्षित रखने के उपाय पर कार्य करना आवश्यक है। असल में लोग भूकम्प की वजह से नहीं मरते, बल्कि नियमों की अनदेखी कर किए गए निर्माण एवं प्रकृति के शोषण की वजह से नुकसान ज्यादा होता है। शहरी विकास नियम व ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड के मार्गदर्शन के अनुसार आपदाओं के मद्देनजर राज्य सरकारों को नियम व कायदे सख्ती से लागू करवाने चाहिए। बिल्डिंग बायलॉज में नींव, निर्माण सामग्री, स्ट्रेंथ बियरिंग कैपेसिटी, सेटबैक व पार्किंग इत्यादि देखने की आवश्यकता है। हाल ही में तुर्की में बिल्डिंग बायलॉज होने के बावजूद घटिया निर्माण की वजह से बड़ी संख्या में मौतें हुईं। शहरी व क्षेत्रीय प्लान के पुन: अवलोकन कर जनसंख्या घनत्व के अनुसार नए शहरों को बसाने की आवश्यकता है। बहुमंजिला इमारतों में जहां ज्यादा परिवार निवास करते हैं, उन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। फ्रेम स्ट्रक्चर के साथ नई तकनीक का प्रयोग, रेट्रो फिटिंग पर ध्यान देने के साथ स्टाफ की ट्रेनिंग की व्यवस्था होनी चाहिए। जापान की तरह बिल्डिंग कोड व आमजन में विद्यार्थी जीवन से ही जागरूकता आवश्यक है।

हमें हमारी पुरानी सभ्यता व संस्कृति का भी अध्ययन कर प्राचाीन वास्तुकला से भी समस्या का समाधान तलाशना होगा। धोलावीरा (हड़प्पा) संस्कृति में पाया गया है कि वहां निर्माण के समय नींव की चौड़ाई निर्धारित थी तथा निर्माण इंटरलॉक प्रणाली से किया गया था। पूर्व में चौकोर बनने वाले भवनों की जगह गोलाकार भवनों का निर्माण किया गया। कच्छ, लातूर, जोशीमठ की आपदाओं से भी सबक लेकर भविष्य में दूसरे शहरों में आने वाली आपदाओं की पूर्व तैयारी आवश्यक है।