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देशवासियों की साझा विरासत है लाल किला

लाल किले का सौंदर्यन या प्रबंधन जो भी कहें, यदि किसी निजी संस्था को सौंपा जाता है तो उसके सोच में केवल व्यापार ही होता है।

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Sunil Sharma

May 01, 2018

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- राजेन्द्र सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता

देश की राजधानी में स्थित लाल किला किसी राजशाही की निशानी भर नहीं है। यह देश की ऐतिहासिक विरासत है। देश की आजादी की घोषणा का गौरवशाली प्रतीक है। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पहली बार तिरंगा संसद भवन या राष्ट्रपति भवन पर नहीं बल्कि लाल किले की प्राचीर पर फहराया था। उन्होंने इसी प्राचीर से घोषणा की थी कि अब देश आजाद हो गया है। अपने देश का प्रबंधन अब अंग्रेज नहीं बल्कि भारत के लोग करेंगे। इसका अर्थ है कि भारत के लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार के हाथों में देश का प्रबंधन होगा। तब से जन-जन के बीच यह मान्यता बन गई कि जिसके हाथ में लाल किले का प्रबंधन होगा, उसी के हाथ में देश का प्रबंधन होगा।

राष्ट्रीय विरासत पर किसी का मालिकाना हक हो ही नहीं सकता। गंगा हो, ताजमहल हो या लाल किला हो, ऐसी विरासतें किसी एक की नहीं बल्कि ये तो देश के लोगों की साझा विरासत होती है। जो उसका प्रबंधन करता है, वही उसका मालिक कहा जाता है। चूंकि पहले दिन से ही देश के लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार लाल किले का प्रबंधन देखती रही है तो यह लाल किला देश के लोगों की संपत्ति है। आमजन उस लाल किले को सरकार समझता है और उसे सुरक्षा, अपनी समस्याओं के समाधान और राष्ट्रीय गौरव का पहला प्रतीक मानता है।

लाल किला देश की आस्था और विश्वास का प्रतीक है। जनता मानती है कि उसने जिन लोगों को अपनी समस्याओं, जीवन की बेहतरी के लिए प्रबंधन का काम सौंपा है, वे लाल किले का प्रबंधन भी पूरी निष्ठा और विश्वास के साथ पूरा करेंगे। लाल किले का सौंदर्यन या प्रबंधन जो भी कहें, यदि किसी निजी संस्था को सौंपा जाता है तो उसके सोच में केवल व्यापार ही होता है। यदि सरकार इसका प्रबंधन करती है तो उसकी सोच में व्यापार नहीं, लोक कल्याण होता है। इसीलिए लाल किले का प्रबंधन निजी हाथों में सौंपना भारत की जनता की आस्था और विश्वास के साथ खिलवाड़ है। क्या भारत सरकार लाल किले का सौंदर्यन नहीं कर सकती? आखिर क्यों, पांच करोड़ रुपए सालाना के आधार पर देश की आस्था का सौदा कर लिया गया?

सवाल धरोहरों को गोद देने का नहीं, बल्कि उनके समुचित संरक्षण का है। लोग यह सवाल करेंगे कि आखिर सरकार देश की आजादी के पहले गौरवशाली प्रतीक का प्रबंधन खुद क्यों नहीं कर सकती? वैसे भी चंद करोड़ रुपयों के लिए लाल किले का प्रबंधन निजी हाथों में सौंपने को जनता बर्दाश्त नहीं करेगी।