
meditation namaste
गौतम बुद्ध जिन्हें बौद्ध दर्शन का प्रवर्तक माना जाता है, उनके लिए संसार दुखों का घर है। संसार में आने वाला हर प्राणी दुखों का पुंज लेकर धरती पर आता है। संसार में कोई आए और दुखों से उसका सम्बन्ध न हो, यह असम्भव है। समस्त बौद्ध विचार चत्वारि आर्य सत्यानि में समाहित है। चार आर्य सत्यों की यात्रा निर्वाण की यात्रा है। जिसकी शुरुआत दुख से होती है। किसी को पिता के मरने का दुख, किसी को पत्नी के मरने का, किसी को विवाह न होने का दुख तो किसी को रोगी होने का और किसी को अभीप्सित की पूर्ति न होने का दुख। संसार में दुख ही दुख हैं और संसार दुखों का घर है।
अष्टांग मार्ग से निर्वाण
निर्वाण है तो उसके प्राप्ति का मार्ग भी है। बौद्ध दर्शन में इसे अष्टांग मार्ग कहा गया है। सम्यक् दृष्टि अर्थात जैसी वस्तु है वैसा ज्ञान है। सम्यक् संकल्प अर्थात दृढ़ इच्छा शक्ति है। दृढ़ इच्छा को वाणी में उतरना सम्यक् वाक् है। केवल वाणी में ही उतरना नहीं अपितु व्यवहार में उतारना सम्यक् कर्म है। सम्यक् आजीव, व्यायाम, सम्यक् स्मृति के अभ्यास के लिए बुद्ध ने विस्तृत उपदेश दिया है।
बुद्ध का व्यावहारिक दृष्टिकोण
गौतम बुद्ध अधिक व्यावहारिक थे। घायल हंस की कथा आती है, जिसके संदर्भ में वे कहते हैं कि जरूरी यह नहीं है कि जिस तीर से हंस घायल हुआ, तीर कहां से आया, तीर चलाने वाला कौन था, वह किस उद्देश्य से तीर चलाया? इन प्रश्नों के उत्तर ढूढऩे की अपेक्षा जरूरी था हंस को घाव से निजात दिलाने का प्रयत्न करना। ऐसे लोग संसार में है या नहीं, संसार क्षणिक है या अनन्त, आत्मा और शरीर एक है या भिन्न-भिन्न, आत्मा है या नहीं, पुनर्जन्म है या नहीं। इन प्रश्नों को पाली साहित्य में अव्यक्तानि कहा गया है। इनके बारे में कुछ कहना ठीक नहीं, अत: ऐसे प्रश्नों पर भगवान बुद्ध मौन रह जाते थे। जिनका बोध यही था कि व्यक्ति ऐसे प्रश्नों में उलझकर विवाद को जन्म न दें। बल्कि अपना कत्र्तव्य आसानी से करता रहे।
प्रज्ञा, शील और समाधि
बौद्ध दर्शन में प्रज्ञा, शील और समाधि के अन्तर्गत अष्टांग मार्ग को समाहित किया गया है। प्रज्ञा के अन्तर्गत सम्यक् दृष्टि व सम्यक् संकल्प आते हैं। प्रज्ञा से व्यक्ति की दृष्टि और संकल्प सधते हैं। शील में सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीव एवं सम्यक् व्यायाम समाहित है। शील में वाणी, कर्म स्वत: आ जाते है। पेशा या व्यवसाय भी शील के ही अंग है। अच्छा करने और बुरा रोकने का अभ्यास शील है। प्रज्ञा और शील की सुखद यात्रा के बाद समाधि तक पहुंचा जाता है। समाधि के पूर्व स्मृति भी समाधि में स्वत: समाहित है। अष्टांगमार्ग को प्रज्ञा, शील और समाधि जैसे त्रिरत्न के अंतर्गत रखा गया है जो जैन त्रिरत्नज्ञान, दर्शन और चारित्र से पृथक है। पूर्ण प्रज्ञा, पूर्ण शील और पूर्ण समाधि से निर्वाण संभव है।
निर्वाण का स्वरूप
निर्वाण को तृतीय आर्य सत्य दु:ख निरोध कहा गया है। इसके कई अर्थ किए जाते हैं। नि:+वान अर्थात् तृष्णा का निरोध निर्वाण है। चूंकि दु:ख तृष्णा से उत्पन्न होता है अत: दु:ख के निरोध को भी निर्वाण कह सकते है। दूसरा अर्थ निर+वाण, निर्वाण अर्थात् बुझ जाना ही निर्वाण है। अश्वघोष ने अपने सौन्दरनन्द ग्रन्थ में निर्वाण की तुलना दीपक के बुझने से दी है। वे कहते हैं कि जैसे बुझा हुआ दीपक न पृथ्वी, न अन्तरिक्ष, न दिशा, न विदिशा में कहीं अस्तित्व नहीं रखता वैसे निर्वाण प्राप्त आत्मा का कहीं अस्तित्व नहीं होता है। वह परमशांति की (बुझने की) स्थिति में होता है।
चार आर्य सत्य
गौतम बुद्ध दु:ख से संसार की यात्रा की शुरुआत मानते हैं किन्तु उनका लक्ष्य दु:खों को स्थापित करना नहीं था। दु:ख की चर्चा दु:ख को जानने के लिए करते हैं, उसके कारणों को ढूंढऩे के लिए करते हैं। दु:ख है तो उसका कारण भी है, जैसे डॉक्टर रोग के निदान के लिए रोग के कारणों को ढूंढते हैं तो रोग का सटीक निदान होता है, वैसे ही दु:ख है तो दु:ख का कारण है और जब कारण का पता चल जाता है तो उसका निवारण हो जाता है। बुद्ध दु:खों के निदान के लिए ही दु:ख का उल्लेख करते हैं। इसे वे दु:ख निरोध कहते हैं। दु:ख निरोध के लिए दु:ख निरोध मार्ग भी बताते हैं। अत: उनका लक्ष्य दु:ख निरोध मार्ग से दु:ख दूर कर निर्वाण को प्राप्त करना है।

Published on:
30 Apr 2018 04:11 pm
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