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स्पंदन: संस्कार-2

पति-पत्नी सम्बन्धों पर, मातृत्व से जुड़े हुए विषयों पर लडक़ी से मां भी चर्चा नहीं करती। मन की बगिया में प्रेम का पौधारोपण ही नहीं होता।

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Gulab Kothari

Apr 22, 2018

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माता-पिता का जीवन ही सन्तान के लिए पुस्तक का कार्य करता है। सांस्कृतिक दृष्टि से ये पृष्ठ खाली दिखाई पड़ते हैं। सन्तान को पढ़ाने के लिए उनके पास आज सामग्री ही नहीं है। शिक्षा भी कैरियर के आठ घंटों पर आकर ठहर गई। इसका लक्ष्य भी नौकरी ही रह गया है। निजी जीवन के विकास में शिक्षा की भागीदारी नहीं होती। नौकरी के बाद का सोलह घंटों का जीवन अज्ञान के अंधकार की भेंट चढऩे लग गया है।

माता-पिता की शिक्षा
माता-पिता ने लडक़ी को मानना ही छोड़ दिया। बराबरी की अवधारणा में उसका नारीत्व भी शरीर तक सिमट गया। दिमाग से तो वह भी पुरुष के समान हो गई। सपने उसके भी कैरियर की उड़ाने भरते हैं। संस्कार तथा नारी की भूमिका का शिक्षण-प्रशिक्षण छूट गया। संयुक्त परिवार की पाठशालाएं बंद होने लगीं या अन्तिम सांसें ले रही हैं। नारी शरीर स्त्रैण शून्य अन्य प्राणियों की तरह मादा रह गया। नर-नारी एक-दूसरे के लिए शरीर के ही पूरक रह गए। यह बन्धन तो अल्पजीवी होता है। उसके आगे तो बस विच्छेद है।

मां-बाप की शिक्षा का मूल पाठ बदल गया। लडक़ी को पति और ससुराल के वातावरण में पूरी उम्र जीने के लिए तैयार ही नहीं किया जाता। पति-पत्नी सम्बन्धों पर, मातृत्व से जुड़े हुए विषयों पर लडक़ी से मां भी चर्चा नहीं करती। मन की बगिया में प्रेम का पौधारोपण ही नहीं होता। दादा-दादी या नाना-नानी के सान्निध्य में रहने वाले बच्चों को अपवाद मानना चाहिए। जो बच्चे माता-पिता के साथ एकल परिवार में पलते हैं, उनका भावनात्मक धरातल कुपोषित ही मिलेगा। आत्मीयता का भाव तो शून्य ही होगा। आत्मा शब्द न घर में और न ही शिक्षा में उपलब्ध है। व्यक्ति बिना आत्मा के स्वयं को शरीर मानकर जीने को मजबूर है। तब मां का सन्तान से भी आत्मीयता का योग कैसे होगा? वहां तो बस जैविक सम्बन्ध ही है बस। जैसा कि अन्य प्राणियों में होता है। जो आत्मा, जिस शरीर को छोडक़र मां के पेट में आई, बिना संस्कारित हुए मानव देह में प्रकट हो गई।

शरीर की भूमिका
पति-पत्नी की स्वरूप व्याख्या हमारे शास्त्रों में भरपूर है। यही तो सृष्टि का महत्वपूर्ण यज्ञ है। सभी देवी-देवता युगल रूप में सदा-सदा से शास्त्रों में वर्णित चले आ रहे हैं। कभी किसी के विच्छेद की नहीं सुनी। विष्णु तो प्रलयकाल में भी रहते हैं। तब भी लक्ष्मी को विष्णु के साथ क्षीर सागर में ही देखा है। अपने सुख के लिए विष्णु से अलग होते नहीं सुना। सीता ने राम के साथ चौदह साल वनवास किया। द्रौपदी ने भी बारह वर्ष वनवास किया। बाद में अज्ञातवास में रहे। गोकुल छोडऩे के बाद कृष्ण पुन: लौटे नहीं। क्या राधा को कभी विश्व ने कृष्ण से अलग माना। इस देश में तो बाली पत्नी तारा, हरिश्चन्द्र पत्नी तारामति आदि को आने वाली पीढिय़ों के लिए उदाहरण स्वरूप जीवित रखा है। यह प्रमाणित करने के लिए कि यह सम्बन्ध मात्र शरीर का नहीं है। सर्जन सीमा के आगे ही शरीर की मुख्य भूमिका शुरू होती है।

जीवन शरीर के साथ कहां जुड़ा है? शास्त्र तो कहते हैं-‘मैं’ शरीर नहीं हूं, शरीर ‘मेरा’ है। तब जीवन को यदि शरीर के साथ जोड़ेंगे तो शरीर के साथ ही समाप्त हो जाएगा। जबकि हमारे यहां आत्मा को अमर कहा है। विवाह को सात जन्मों का रिश्ता कहा है। आज की कैरियर की शिक्षा व्यक्ति को सुविधाओं के पीछे भागना सिखाती है। व्यक्ति के साथ नहीं जोड़ती। सुविधा का भोग भी शरीर से ही जुड़ा है। संसार के नए माध्यमों ने भी व्यक्ति को सामूहिक जीवन से दूर करके एकल स्वरूप को ही प्रतिष्ठित किया है। इंटरनेट, मोबाइल फोन ने तो व्यक्तिगत व्यवहार की आवश्यकता को ही समाप्त कर दिया है। आदान-प्रदान के अवसर तक अल्पतम कर डाले। सारे कार्य फोन से होने लग गए। इस नई जीवन शैली में ‘मैं’ सर्वोपरि होता चला गया। हर दूसरा व्यक्ति अस्तित्व से बाहर होता जा रहा है। उपयोग काल के बाद किसी की जरूरत ही नहीं रही। अर्थात् व्यक्ति साधन बनकर रह गया।