
आधुनिक भारतीय चित्रांकन परम्परा के कीर्तिस्तम्भ राजा रवि वर्मा के बनाए हुए माता सरस्वती और महाराणा प्रताप के चित्र और एक हाथघड़ी के डायल पर सजा राजा रवि वर्मा का एक चित्र (सबसे बाएं)।
तृप्ति पांडेय
पर्यटन व संस्कृति विशेषज्ञ
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कभी-कभी यों भी होता है कि मंजिल खुद चलकर हमारे पास आ जाती है और हमें अहसास होता है एक वास्तविक सांस्कृतिक यात्रा का। पिछले हफ्ते गुलाबी नगर जयपुर में राजा रवि वर्मा की कला यात्रा को जयमहल के शाही माहौल में जिस जुदा अंदाज में जिया, उसने कुछ ऐसा ही अहसास दिया। इस अहसास के साथ उस शाम ही यह भी तय कर लिया कि अगली बार केरल की यात्रा में उनके किलीमानूर के महल को देखने जरूर जाऊंगी। राजा रवि वर्मा का नाम बहुतों ने नहीं सुना होगा पर उनकी बनाई लक्ष्मी जी की और सरस्वती जी की प्रतिलिपि को न केवल बहुतों ने देखा भी है, बल्कि अपने घरों में लगाया भी है।
राजा रवि वर्मा आधुनिक भारतीय चित्रांकन परम्परा का एक ऐसा नाम हैं जिनके चाहने वाले विदेशों तक फैले हैं और जिनके बनाए चित्र भारत के पुराने राजाओं के महलों में बने संग्रहालयों का बेशकीमती संग्रह हैं। जिस शाम की मैं चर्चा कर रही हूं उसका अन्दाज इसलिए निराला था क्यों कि उस शाम को उनके वंशज राम वर्मा किलीमानूर से राजा रवि वर्मा का साल भर मनाए जाने वाले 175वें जन्मदिन को मनाने पहली बार जयपुर आए थे। उस जश्न के जयपुर में होने के पीछे थी जयपुर की एक वॉच कंपनी जिसने समय को समय विहीन कला से जोडऩे के मकसद से ही राजा रवि वर्मा के चित्र घड़ियों के डायल पर सजाने का इरादा किया। और यह इरादा उस सर्वेक्षण के आधार पर किया गया जिससे यह पता चला कि आज के आधुनिक लोगों में 70 प्रतिशत लोग उस आधुनिक भारतीय कलाकार के नाम से अनजान थे।
मोगरे के फूलों की सुगंध से महकते केरल की भवन शैली को जीते मंडप में एक ओर जहां राजा रवि वर्मा के चित्र लगे थे तो दूसरी ओर थीं वे घडिय़ां। साथ में थीं केरल से आई हुईं वे महिला कलाकार जो राजा रवि वर्मा की कला शैली में चित्र बना रही थीं और तब वहीं पर देखी किलीमानूर महल की तस्वीर। उसके बाद जब राम वर्मा ने अपनी आवाज से उस मंडप को गुंजा दिया तो लगा मानो राजा रवि वर्मा हमारे आसपास थे। फिर आए केरल के चेंडा मेलम वादक जिनकी ताल की गूंज और गति ने मानो केरल के सारे उत्सव सामने ला दिए। इतना ही नहीं, आखिर में उनके पारिवारिक रसोइयों के दल ने वहां से लाए गए मसालों के साथ जयमहल की टीम को लेकर केले के पत्तलों पर जो खाना खिलाया उसकी चाहत तो बनी रहेगी।
राजा रवि वर्मा किलीमानूर महल में पैदा हुए थे और उन्हें राजा का खिताब लॉर्ड कर्जन ने दिया था। त्रावणकोर, जो अब केरल के नाम से जाना जाता है, के इस महल की दीवारों पर बालक रवि वर्मा ने बचपन से ही चित्रांकन शुरू कर दिया था। उनकी प्रतिभा को पहचाना उनके चाचा राज राजा वर्मा ने और फिर उन्होंने रवि वर्मा की कला शिक्षा का इंतजाम किया। रवि वर्मा ने तंजौर कला सीखी और उनके दो गुरु बने मदुरै के अलाग्री नायडू तथा विदेशी चित्रकार श्री थियोडोर जेंसन। यही कारण है कि उनकी शैली में यूरोपीय प्रभाव तो आया पर अपनी तीन तरह की कृतियों में भारत का ही जीवन चित्रित किया। उनके तीन तरह के चित्रों में थे शाही पोट्रेट, धार्मिक और पौराणिक पात्र और आम जीवन।
राजा रवि वर्मा एक बार उदयपुर आए थे तो महाराणा बाहर शिकार पर गए हुए थे तो उन्होंने लोगों से सुनकर, किताबों में पढ़कर महाराणा प्रताप का वह चित्र बनाया जिससे हम राणा प्रताप को पहचानते हैं। वह एक अनूठे कलाकार थे और उस काल के पास थे जिसमें यूरोप के वैन गॉग और मोने जैसे कलाकार हुए थे और जिनके नाम और काम की वजह से मेरे जैसे लोग उनसे जुड़ी जगहों की यात्रा करते हैं। तो फिर अगली बार किलीमानूर क्यों नहीं! राजा रवि वर्मा की कला यात्रा को भारत के पर्यटन के साथ जोडऩा सांस्कृतिक पर्यटन के लिए एक अच्छा कदम होगा और लोगों के लिए विरासत को जानने का एक नया अनुभव भी!
Updated on:
10 Aug 2023 10:25 pm
Published on:
10 Aug 2023 10:19 pm
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