
election in india voting
- सुदेश वर्मा, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता
आजादी के बाद काफी सालों तक पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ सम्पन्न होते रहे हैं। लेकिन, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सत्ता संभालने के बाद राजनीतिक विद्वेष के चलते चुनाव कार्यक्रमों में फेरबदल किया गया। ऐसा माना जाता है कि इंदिरा गांधी जिस राज्य की सरकार को पसंद नहीं करती थीं, उसे बर्खास्त कर देती थीं और वहां चुनाव करवाने पड़ते थे। राज्य सरकारों के बीच में बर्खास्तगी से मध्यावधि चुनावों की परिपाटी पड़ी। इससे राज्यों में अलग-अलग समय पर मतदान कराने की बाध्यता हुई।
स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर लोकसभा उपचुनाव तक, आज देश में हर समय कहीं न कहीं चुनाव का आयोजन होता रहता है। राजनेता और सरकारों के इन चुनावों की तैयारियों में व्यस्तता के चलते जनकल्याणकारी योजनाएं और नागरिक सेवा से जुड़े प्रशासनिक काम अटके रहते हैं। मतदान के दौरान सरकारी मशीनरी तो अनावश्यक व्यस्त रहती ही है मतदाताओं को भी अपने रोजमर्रा के काम-धंधे छोडक़र इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुडऩा पड़ता है। देश में हर समय चलती चुनाव प्रक्रिया के कारण अर्थव्यवस्था पर भार पड़ता है सो अलग। कहीं सत्तारूढ़ दल पंचायत का भी कोई उपचुनाव स्थानीय कारणों से हार जाता है तो विपक्षी दल तुरंत सत्तापक्ष पर हमला करते हुए उसकी नीतियों को विफल करार दे देते हैं। और, सरकार को तुरंत इस्तीफा देकर चुनावों का सामना करने की चुनौती देते नजर आते हैं।
देश अथवा राज्यों में किसी न किसी चुनाव के चलते या निकट भविष्य में आने वाले चुनावों के चलते सरकार के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यही होती है कि वह खुलकर न तो नीतिगत फैसले ले सकती है और न ही विकास की योजनाओं पर अमल कर पाती है। सत्तासीन राजनीतिक दलों को हमेशा यही डर रहता है कि कहीं उसके किसी नीतिगत फैसले से उसके समर्थक नाराज न हो जाएं और उसे चुनाव में हार का मुंह न देखना पड़े। ऐसे में सरकारों को अपने समर्थकों को जोड़े रखने के लिए मजबूरन लोकलुभावन फैसले लेने पड़ते हैं।
वर्तमान में विश्व के कई देशों में राष्ट्रीय स्तर के और स्थानीय स्तर के चुनाव एक साथ कराने की योजना सफलतापूर्वक काम कर रही है। हमारे देश में अगर यह प्रक्रिया अपनाई जाती है तो यहां की सरकारें और नेता बिना किसी दबाव के लोकतांत्रिक फैसले ले सकेंगे। राजनेता भी चुनावी तैयारियों की चिंता छोड़ विकास पर ध्यान दे पाएंगे और आए दिन होने वाले चुनावों से पडऩे वाला आर्थिक भार भी कम होगा। अगर समस्त देश में एक साथ चुनाव होते हैं तो यह न सिर्फ राजनीतिक दलों वरन मतदाताओं के लिए भी राहतभरा कदम होगा।

Published on:
07 Oct 2017 04:14 pm
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