25 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कब जागोगे?

बढ़ते वाहनों से निकलने वाला जहरीला धुंआ नजर तो सबको आ रहा है लेकिन खामोशी की चादर के नीचे सब दबकर रह गया है।

2 min read
Google source verification

image

Sunil Sharma

Nov 15, 2017

pollution

pollution

कहावत है- ‘जब तक सांस, तब तक आस।’ यानी जब तक जिन्दगी है, तब तक उम्मीद बाकी है। लेकिन लगता है बढ़ता प्रदूषण आम आदमी की जिन्दगी को नरक बनाकर ही छोड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) और उस जैसी अनेक संस्थाएं देश भर में बढ़ते प्रदूषण पर लगातार चिंता जता रही हैं। सरकारों को फटकार भी लगा रही हैं। अपनी तरफ से सुझाव भी दे रही हैं। लेकिन सरकारें हैं कि लीपापोती के अलावा कुछ करती नजर नहीं आ रहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बढ़ते प्रदूषण को इमरजेंसी की संज्ञा देते हुए सरकार से पूछ ही डाला कि इसकी रोकथाम के लिए वह क्या कर रही है? अदालत ने पूछा कि राष्ट्रीय राजधानी और आस-पास प्रदूषण का स्तर चिंताजनक है लेकिन सरकार कुछ करती नजर नहीं आ रही। बढ़ते वाहनों से निकलने वाला जहरीला धुंआ नजर तो सबको आ रहा है लेकिन खामोशी की चादर के नीचे सब दबकर रह गया है। वाहनों की संख्या पर नियंत्रण के लिए सरकारें प्रभावी योजनाएं नहीं बना पा रही हैं। कारखानों से निकलने वाले दमघोंटू धुंए को रोकने के लिए भी सरकारी महकमों के पास कारगर योजना नहीं है।

देखा जाए तो चीन की आबादी हमसे अधिक है और वाहन भी अधिक ही हैं। लेकिन वहां की सरकार और स्थानीय प्रशासन वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए तमाम जरूरी उपाय करते रहते हैं। वायु स्तर के इंडेक्स पीएम २.५ का लेवल चीन की राजधानी में ७३ माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पर है जबकि दिल्ली में यह लेवल १३२ माइक्रोग्राम है। चीन अपने ७३ के लेवल को ६० तक लाने की योजना पर काम कर रहा है। वहां लोगों के लिए जागरूकता अभियान चलाने के साथ-साथ सार्वजनिक परिवहन के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया जाता है।

कारखानों से निकलने वाले धुंए पर नियंत्रण के साथ-साथ सडक़ों की सफाई को प्राथमिकता दी जाती है। पेट्रोल-डीजल से चलने वाले वाहनों की जगह साइकिल की सवारी को प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि प्रदूषण भी रोका जा सके और शरीर की कसरत भी हो जाए। लेकिन हमारे यहां कल को सुरक्षित बनाने के लिए आज कोई तैयारी ही नहीं दिखती। लगता यही है कि अदालतें नहीं चेताएं तो सरकारें तो चादर तानकर सोती ही रहें।