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क्या संभव हो पाएगी वतन वापसी?

म्यांमार से भागते रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या ने दक्षिण एशिया के देशों के सामने गंभीर शरणार्थी संकट खड़ा कर दिया है

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Sunil Sharma

Sep 20, 2017

rohingya

- प्रो. गंगानाथ झा, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

रोहिंग्या समस्या : म्यांमार से पलायन करती मुस्लिम आबादी दक्षिण एशियाई देशों की सुख और शांति के लिए परेशानी का कारण बनती जा रही है। म्यांमार की सरकार के सेना को मूक समर्थन ने पड़ोसी देशों की समस्याओं को और बढ़ा दिया है। क्या विश्व समुदाय इस समस्या के समाधान के लिए म्यांमार सरकार पर दबाव बना पाएगा?

म्यांमार के तत्कालीन प्रधानमंत्री यू नु ने देश में लम्बे समय से निवास कर रही आठ जातिगत समूहों को जिनमें रोहिंग्या भी शामिल थे, नागरिक अधिकार बहाल करने की कोशिश की तो सेना ने राष्ट्रीय एकता के नाम पर तख्तापलट कर सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ले ली।

म्यांमार से भागते रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या ने दक्षिण एशिया के देशों के सामने गंभीर शरणार्थी संकट खड़ा कर दिया है। म्यांमार के अरकान क्षेत्र का रखीन प्रांत मुस्लिम बहुल है। गौरतलब है कि अंगे्रजों के शासन के समय एकीकृत भारत के बांग्लाभाषी क्षेत्र (वर्तमान बांग्लादेश) से तत्कालीन बर्मा में खेतों में व अन्य घरेलू कामों के लिए काफी संख्या में मजदूरों को वहां (म्यांमार) ले जाया गया था। इनमें बड़ी तादाद बंगाली मुस्लिम कामगारों की थी। अंग्रेजों ने जब बर्मा को स्वतंत्र किया ये लोग वापस नहीं लौटे और वहीं बस गए।

पिछले कुछ समय से म्यांमार की सेना ने वहां सदियों से रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसक अभियान छेड़ रखा है। सेना के हमलों के डर से रोहिंग्या मुस्लिम अपनी जान बचाने के लिए पड़ोसी देशों की ओर बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं। पड़ोसी देशों खासकर बांग्लादेश में लाखों की संख्या में रोहिंग्या प्रवेश कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब चालीस हजार रोहिंग्या भारत में भी शरण लिये हुए हैं। ऐसा लगता है कि रोहिंग्याओं की समस्या न सिर्फ म्यांमार बल्कि समूचे दक्षिण एशिया के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही है। कहने को तो म्यांमार में लोकतंत्र की स्थापना हो चुकी है लेकिन यह बात किसी से छिपी नहीं है कि यंगून में अब भी सत्ता पर सेना का जबर्दस्त प्रभाव रहता है। किसी भी निर्वाचित सरकार के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह सत्ता में बने रहने के लिए सेना को साथ लेकर चले।

उल्लेखनीय है कि म्यांमार की सेना रोहिंग्याओं को म्यांमार का नागरिक मानने को ही तैयार नहीं है। सेना, इन्हें अब भी घुसपैठिया ही मानती है। कोई भी सरकार इन्हें नागरिक अधिकार देने का प्रयास करती है तो सेना सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेने में देर नहीं लगाती। म्यांमार की सेना का जातीय समूहों व प्रवासियों के खिलाफ प्रारम्भ से ही काफी सख्त रवैया रहा है। वर्ष १९६२ में भी जब म्यांमार के तत्कालीन प्रधानमंत्री यू नू ने देश में लम्बे समय से निवास कर रहे आठ जातिगत समूहों को जिनमें रोहिंग्या भी शामिल थे, नागरिक अधिकार बहाल करने की कोशिश की तो सेना ने राष्ट्रीय एकता के नाम पर तख्तापलट कर दिया और सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ले ली।

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि रोहिंग्याओं को अभी भी म्यांमार में नागरिक अधिकार हासिल नहीं है। उन्हें वहां विदेशी ही माना जाता है। जहां तक सेना की नाराजगी का सवाल है तो कहा जा सकता है कि एक तो सेना बौद्धों के अलावा किसी दूसरे जातीय समूह को म्यांमार का नागरिक मानने को तैयार नहीं है। दूसरा, अधिकतर रोहिंग्या निचले तबके से सम्बंध रखते हैं। सेना व वहां के आम लोगों को इनकी जीवनशैली पसंद नहीं आती। तीसरे, पिछले कुछ सालों से रोहिंग्या म्यांमार में अशांति का कारण बनते जा रहे हैं। बौद्धों और रोहिंग्याओं के बीच हिंसक झड़पें होती रही हैं। समय-समय पर आरोप लगते रहे हैं कि पाकिस्तान की आईएसआई और वहां स्थित विभिन्न आतंकी संगठन रोहिंग्याओं को उकसाकर म्यांमार में कई हिंसक घटनाओं को अंजाम दे चुके हैं।

हाल ही पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद ने भी रोहिंग्याओं के समर्थन में बयान देकर इन आशंकाओं को बल ही दिया है। ऐसे में भारत सरकार के लिए रोहिंग्या अथवा म्यांमार सरकार, दोनों में से किसी एक के पक्ष में खड़ा होना काफी कठिन होगा। म्यांमार भारत का करीबी मित्र और पड़ोसी देश है। अनेक अवसरों पर म्यांमार भारत का विश्वसनीय सहयोगी बनकर सामने आया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में भी म्यांमार सबसे अहम देश है। इसकी नजदीकी चीन से भी है। ऐसे में भारत सरकार, म्यांमार की नाराजगी का खतरा नहीं लेना चाहेगी। भारत लम्बे समय से आतंकी घटनाओं से जूझता रहा है। इन हालात में शरणार्थी के रूप में बड़ी संख्या में आने वाले रोहिंग्याओं में से थोड़े भी आतंकवाद का समर्थन करने वाले निकले तो यह स्थिति भारत की परेशानियों में इजाफा करने वाली ही होगी।

देश की खुफिया एजेंसियां भी रोहिंग्याओं की गतिविधियों के बारे में सरकार को ऐसी ही जानकारियों को लेकर चेता चुकी है। ऐसे में सरकार का रोहिंग्याओं को उनके वतन वापस भेजने का फैसला उचित ही कहा जाएगा। देश में पहले ही अशांत पड़ोसी देशों से भागकर आए करोड़ों शरणार्थी निवास कर रहे हैं। सबसे बड़ा प्रश्न तो इनके वतन वापसी का है। क्या म्यांमार की सरकार इनको स्वीकार करेगी? म्यांमार की नेता आंग सान सू की का बयान उनकी मंशा को दर्शाता है।

सू की ने संयुक्त राष्ट्र के अधिवेशन में कहा कि म्यांमार रोहिंग्याओं को वापस स्वीकारेगा पर उन्हें साबित करना होगा कि वे म्यांमार के नागरिक हैं। सू की का यह बयान रोहिंग्याओं के जख्मों पर नमक छिडक़ने वाला ही कहा जाएगा। आज तक रोहिंग्याओं को म्यांमार की सरकार ने ही अपना नागरिक नहीं माना और उन्हें सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित रखा है तो वे कैसे अपने आप को म्यांमार का नागरिक साबित करेंगे। ताजा पलायन से करीब पचास प्रतिशत रोहिंग्या तो म्यांमार से भाग चुके हैं और उनका भागना अब भी जारी है। महत्वपूर्ण तो यही है कि क्या रोहिंग्याओं की वतन वापसी संभव हो पाएगी?