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कहावत है चुल्लू भर पानी में डूब मरो। हम अब तक समझ नहीं पाये कि हमारे बुजुर्गों ने यह कहावत क्यूंकर बनाई होगी।
क्योंकि जवानी में एकाध बार हमने चुल्लू भर पानी में डूबने का प्रयास किया (हालांकि हम मरना नहीं चाहते थे, लेकिन इतने से पानी में डूबने का 'एक्सपेरिमेन्टÓ तो बगैर जान जोखिम डाले किया ही जा सकता है) पर डूब न सके।
लेकिन जैसे-जैसे उम्रदराज होते गए वैसे-वैसे समझ आ रहा है कि हमारे बड़कों ने यह कहावत उन लोगों के लिए बनाई है जो आंख होते हुए भी अंधे बने रहते हैं और एक दिन न केवल खुद डूबते हैं, साथ ही अपनी औलादों को भी ले डूबते हैं। इस बार अप्रेल की गर्मी ने हमें अपनी औकात बता दी।
अभी आधा ही चैत बीता था कि सारे उत्तर भारत में पानी के लिए हाय-हाय मच गई। इन सबके बीच हमने एक किसान भाई चतर सिंह के विचार पढ़े तो लगा कि सचमुच हम अपने शत्रु खुद ही हैं।
हम इतनी नाकाबिल औलाद सिद्ध हो रहे हैं कि जो न केवल अपने बुजुर्गों की भौतिक विरासत को संभालने में नाकारा सिद्ध हुए हैं, साथ ही हम उनकी बौद्धिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विरासत को तो झेल तक नहीं पा रहे हैं।
हमारा हाल उस पहलवान के पुत्र का सा साबित हो रहा है जो मजे-मजे में पन्द्रह-पन्द्रह सेर के मुद्गरों को दोनों हाथों से घुमा लेता था और उसका कमजोर बेटा दोनों हाथों से एक मुद्गर भी उठा नहीं पा रहा है।
पानी के मामले में तो हद ही हो गई। हम स्वयं पानी के शत्रु बन गए हैं। पानी को ऐसे बर्बाद करते रहे हैं जैसे वो बेकार की चीज है। क्या कभी किसी ने सोचा कि एक जमाने में एक लीटर पानी बीस रुपए में बिकेगा। पानी के लिए शहरों में लोग हजारों रुपए खर्च कर रहे हैं। बावजूद इसके पानी सिर्फ पैसे वालों को उपलब्ध है।
कई जगह तो पानी की लूट रोकने के लिए सरकार ने राइफलधारी पुलिस लगा रखी है। यह सब क्यूं हो रहा है। इसलिए नहीं कि हमारी आबादी बढ़ गई या फिर हमने पानी का उपयोग ज्यादा करना शुरू कर दिया, इसलिए कि हमने पानी सहेजने के पुराने तरीकों को छोड़ दिया। मरुभूमि में पानी की एक-एक बूंद अमृत की तरह होती है पर हमने इसी पानी की कद्र करना बंद कर दी।
हमने विरासत में मिले पानी को संग्रह करने वाले स्रोतों को अपने हाथों ही बर्बाद कर डाला। राजधानी में कितने बड़े-बड़े विशाल भवन हैं लेकिन क्या उनमें वर्षा का पानी संचय करने पर जोर दिया? समाज ने अपने हजारों वर्षों के अनुभव पर आधारित योजना बनाई, यही हमारी विरासत थी। लेकिन आज वही विरासत कैसे दम तोड़ रही है।
पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र का कहना सही है आज तो सारे देश में अच्छे विचारों का भी अकाल पड़ा है। जिस समाज में अच्छे लोग, अच्छे विचार और पीने के पानी का अकाल है उस समाज को डूब कर मरने के लिए चुल्लू भर पानी ही काफी है।
- राही
हम स्वयं पानी के शत्रु बन गए हैं। पानी को ऐसे बर्बाद करते रहे हैं जैसे वो बेकार की चीज है। क्या कभी किसी ने सोचा कि एक जमाने में एक लीटर पानी बीस रुपए में बिकेगा।
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