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फिर सरकार सुरक्षित कैसे

राहुल गांधी द्वारा चीन के राष्ट्रपति का जिक्र भी मोदी जी को चुभ गया। वे जानते हैं कि चीन के तेवर ज्यादा आक्रामक हुए हैं। देश की सीमाएं पहले से ज्यादा असुरक्षित हैं।

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Sunil Sharma

Jul 27, 2018

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- योगेन्द्र यादव, विश्लेषक

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव खारिज हो गया। सरकार संसद में पहले भी सुरक्षित थी, अब और भी आश्वस्त हो गई। विपक्ष भी सरकार पर कुछ छींटाकशी कर अपने आप से खुश हो गया। गले से कहने में जो कसर रह गई, वह गले लग कर पूरी की गई। सत्ताधारी मोर्चे में कुछ टूट-फूट होने से विपक्ष भी आश्वस्त है। मीडिया को भी मसाला मिल गया- मोदी जी और राहुल गांधी के गले पडऩे की फोटो रोज-रोज थोड़े ही मिलती है? ऊपर से रफाल डील का मसाला!

दिल्ली में संसद और स्टूडियो में बैठे सब लोग सुरक्षित हैं। लेकिन क्या देश पहले से ज्यादा सुरक्षित है? अविश्वास प्रस्ताव पर बहस देखते वक्त बार-बार मन में यह सवाल आ रहा था। तीन साल से देश के कोने-कोने में देखे दृश्य घूम रहे थे। मेरे अंदर कोई चिल्ला रहा था - ये सब झूठ है। आज देश का हर वर्ग, हर समुदाय पहले से अधिक असुरक्षित है।

इधर संसद में बहस हो रही थी, उधर संसद मार्ग पर कई राज्यों से पहुंचे हजारों किसान सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास कर रहे थे। वे कह रहे थे कि किसान को ‘ऐतिहासिक’ एमएसपी देने की घोषणा ऐतिहासिक छलावा है। सच यह है कि किसान असुरक्षित है क्योंकि उस पर या तो फसल की बर्बादी की मार हुई है, या वह अच्छी फसल होने पर बाजार में भाव गिरने का शिकार हुआ है। एक तरफ किसान की आय दोगुनी करने का जुमला है, दूसरी तरफ यह सच्चाई कि पिछले चार साल में किसान की वास्तविक आय जस की तस रही है।

इधर, प्रधानमंत्री संसद में रोजगार के नए-नए आंकड़ों का आविष्कार कर रहे थे, उधर मैं एसएससी के विरुद्ध प्रदर्शन करते युवाओं को देख रहा था। सच यह है कि देश का युवा असुरक्षित है क्योंकि इस सरकार के राज में सरकारी नौकरियों में कटौती हुई है। जो मिल रही हैं उनमें धांधली जारी है, चाहे जो भी सरकार हो, जो भी पार्टी सत्ता में हो। संगठित क्षेत्र का रोजगार पहले जैसी स्थिति में है और असंगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर घटे हैं। बुरी खबर देश तक न पंहुचे, इसलिए सरकार ने चुपचाप लेबर ब्यूरो का वो सर्वे ही बंद करवा दिया है जो रोजगार के प्रामाणिक आंकड़े दे सकता था।

बहस में एक मार्के की बात मैंने नोट की। इस बार न तो प्रधानमंत्री ने और न ही अन्य किसी प्रवक्ता ने नोटबंदी का जिक्र किया। शायद बीजेपी को भी समझ आ गया है कि अर्थव्यवस्था अब भी नोटबंदी के तुगलकी फैसले की मार से उबर नहीं पाई है। उधर, जीएसटी पर एक बार फिर कुछ बदलाव कर यह भी कबूल कर लिया गया कि इस व्यवस्था से व्यापारी परेशान थे। सच यह है कि पहली बार छोटा व्यापारी बीजेपी के राज में असुरक्षित है क्योंकि व्यापार-धंधा मंदा चल रहा है।

आंखें लोकसभा अध्यक्ष पद पर सुमित्रा महाजन जी को देख नारी शक्ति के प्रति आश्वस्त होना चाहती थीं, लेकिन मन की आंखें अखबारों की अनगिनत खबरें देख रही थीं। सच यह है कि देश में आज भी महिला पहले जितनी ही असुरक्षित है। ‘और नहीं नारी पर वार’ का नारा देने वाली इस सरकार की नाक के नीचे आए दिन महिलाओं और बच्चियों के विरुद्ध नृशंस हिंसा की खबरें आती हैं।

सामजिक न्याय के सवाल पर सरकार की ढाल बने राम विलास पासवान का भाषण सुन रहा था, और उनके चेहरे को भी पढ़ रहा था। उनके हाव-भाव सच की चुगली कर रहे थे। २ अप्रेल को हुआ भारत बंद गवाह है कि अत्याचार विरोधी कानून को कमजोर करने पर दलित समाज चिंतित और असुरक्षित है। ९ अगस्त को एक और राष्ट्रव्यापी विरोध की तैयारी है। जिस रात अविश्वास प्रस्ताव पर वोट हुआ, तब तक अलवर में रकबर खान पर भीड़ का जानलेवा हमला नहीं हुआ था। लेकिन उससे बहुत पहले से धार्मिक अल्पसंख्यक अपूर्व असुरक्षा के दौर से गुजर रहे हैं। राज्यसभा में नागरिकता को धार्मिक आधार पर परिभाषित करने और मुस्लिम आप्रवासियों को नागरिकता से वंचित करने के कानून पर विचार हो रहा है।

बहस का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री ‘जुमला स्ट्राइक’ के तंज पर भडक़ उठे थे। शायद इसलिए भडक़े थे कि वे जानते हैं सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद पाकिस्तान की ओर से सीमापार घुसपैठ बढ़ी है। कश्मीर में आतंकी हमले बढ़े हैं, सेना और सुरक्षा बलों के शहीदों की संख्या दोगुनी हुई है। पड़ोस के पुराने मित्रों से संबंध भी कमजोर हुए हैं। राहुल गांधी द्वारा चीन के राष्ट्रपति का जिक्रभी मोदी जी को चुभ गया। वे जानते हैं कि चीन के तेवर ज्यादा आक्रामक हुए हैं। देश की सीमाएं पहले से ज्यादा असुरक्षित हैं।

संसद में बहस पूरी हो गई थी। मेरे सवाल अधूरे रह गए थे। अगर देश असुरक्षित है तो सरकार सुरक्षित कैसे है? जो विपक्ष एक दिन के लिए भी सरकार को घेर नहीं पाया, वो इतना आश्वस्त कैसे है? बेडिय़ों में कसा टीवी इतना मुस्करा क्यों रहा है? इस राष्ट्रीय असुरक्षा का मुकाबला कौन करेगा? मेरे अंदर से आवाज आ रही थी - आज चुनौती देश बचाने की है। देश बचाने के लिए सिर्फ विरोध नहीं, विकल्प चाहिए। सिर्फ वादे और सपने नहीं, नई दृष्टि चाहिए। सिर्फ नए चेहरे नहीं, राजनीति में नया जुनून और नई मर्यादा चाहिए। देश बचाना है तो सिर्फ नए चुनावी समीकरण नहीं, नई राजनीतिक संभावना की जरूरत है जो हमारे संविधान के मूल्यों में फिर आस्था जगा सके, देशधर्म की रक्षा कर सके। मेरी आंखें संसद से दूर सडक़ पर जा रही थीं।