
गंगा नदी के हर सैम्पल में मिले हैं प्लास्टिक के 5 एमएम से छोटे टुकड़े
'गंगा नदी में माइक्रोप्लास्टिक का मात्रात्मक विश्लेषण' शीर्षक से हाल ही जारी अध्ययन में बताया गया है कि पांच राज्यों से लेकर बंगाल की खाड़ी तक ढाई हजार किलोमीटर लंबा रास्ता तय करने वाली गंगा नदी माइक्रोप्लास्टिक से बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी है। पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाली दिल्ली स्थित गैर सरकारी संस्था टॉक्सिक्स लिंक की ओर से कराए गए इस अधययन में पाया गया कि हरिद्वार हो, कानपुर या वाराणसी, जितने भी सैम्पल देश की राष्ट्रीय नदी गंगा से जुटाए गए, सभी में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद है। माइक्रोप्लास्टिक का अर्थ प्लास्टिक के उन महीन टुकड़ों से समझा जा सकता है, जिनका आकार 5 एमएम या इससे कम हो। यह माइक्रोप्लास्टिक न केवल नदी की पारिस्थितिकी से जुड़े वातावरण में रहने वाले मनुष्यों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है, बल्कि समुद्री जीवों के लिए भी हानिकारक है। करीब 663 जलचर प्रजातियों पर इस जल प्रदूषण का दुष्प्रभाव पड़ा है। इनमें से माइक्रोप्लास्टिक निगल लिए जाने से प्रभावित होने वाले जीव लगभग 11 प्रतिशत हैं।
खाद्य शृंखला में माइक्रोप्लास्टिक!
जलस्रोतों में पाए जाने वाले प्लास्टिक के कचरे में माइक्रोप्लास्टिक सबसे खतरनाक माना जाता है। मछली, प्रवाल, समुद्री स्तनपायी जीव कई बार इन सूक्ष्म प्लास्टिक कणों को निगल लेते हैं और इसी तरह यह माइक्रोप्लास्टिक मनुष्य की खाद्य शृंखला में शामिल हो जाता है। मानव के संदर्भ में देखा जाए तो खाने से लेकर पानी और खाद्य पदार्थ रखने के पात्रों तक में माइक्रोप्लास्टिक पाया जाता है। अनजाने में ही इसका सेवन गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन जाता है। अध्ययन में जो सैम्पल लिए गए, उनमें सिंगल यूज प्लास्टिक व अन्य प्लास्टिक उत्पाद भी पाए गए। इनमें वाराणसी के सैम्पल में प्लास्टिक प्रदूषण की मात्रा सर्वाधिक पाई गई।
समुचित नहीं है अपशिष्ट निस्तारण-
इस ताजा अध्ययन ने एक बार फिर इस ओर ध्यान खींचा है कि ठोस व तरल अपशिष्ट का समुचित निस्तारण नहीं हो रहा। गैर-सरकारी संस्था की मुख्य समन्वयक प्रीति महेश के अनुसार, 'निस्संदेह प्लास्टिक का कचरा सीधे ही नदी में बहाया जा रहा है। यह कहीं न कहीं अपशिष्ट निस्तारण संबंधी कुप्रबंधन को ही दर्शाता है। इसलिए इस समस्या का निदान करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।' घनी आबादी वाले शहरों में सीवेज व औद्योगिक अपशिष्ट और नष्ट न हो सकने वाले प्लास्टिक को सीधे नदी में बहाए जाने से भी गंगा में प्लास्टिक प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। अंतत: यह बंगाल की खाड़ी में और फिर हिन्द महासागर में ही पहुंचता है।
गंगा की सफाई के प्रयास-
यदि जलग्रहण क्षेत्र के लिहाज से देखा जाए तो गंगा का नदी बेसिन सबसे बड़ा है और यह देश के कुल भूभाग का करीब 26 प्रतिशत है जोकि 11 राज्यों में फैला हुआ है। देश की लगभग 43 प्रतिशत आबादी के जीवन को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से यह प्रभावित करता है। गंगा को प्रदूषणमुक्त करने की कवायद करीब 40 सालों से जारी है। इनमें से ज्यादातर प्रयास नदी के किनारों पर बसे बड़े शहरी केंद्रों में सीवेज ट्रीटमेंट क्षमताओं के निर्माण या विस्तार से जुड़े रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार इन सभी योजनाओं पर भले ही अब तक करोड़ों रुपए बहाए जा चुके हों, लेकिन धरातल पर सफलता का आकलन किया जाए तो यह बेहद मामूली है।
Published on:
26 Jul 2021 09:14 am
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