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फर्जी खबरों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा, बल्कि बढ़ता जा रहा है। सोशल मीडिया पर कल एक सूचना वायरल हो रही थी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रात नौ बजे राष्ट्र के नाम संदेश देंगे, जिसमें बड़ी घोषणाएं हो सकती हैं। यह सूचना भी ‘फेक’ निकली। मतलब यह कि सोशल मीडिया पर कुछ भी लिख दो। सच या झूठ। किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं है! किसी के खिलाफ भी कीचड़ उछाला जा सकता है। आपको ना कोई रोकने वाला है और न टोकने वाला। हिंदुस्तान ही नहीं आज पूरी दुनिया ऐसे सोशल मीडिया से त्रस्त है या कहें कि सोशल मीडिया पर चल रही फर्जी खबरों से त्रस्त है। खबरों के कारण आज दुनियाभर में सरकार बनाने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का चुनाव आपको याद ही होगा। हाल ही ‘ट्विटर’ के सहसंस्थापक इवान विलियम ने तो ट्रंप के चुनाव में सोशल मीडिया की भूमिका पर माफी मांगी है।
आज यह स्पष्ट हो चुका है कि चुनाव के दौरान उस समय जितनी खबरें मेनस्ट्रीम मीडिया में चली थीं उससे कई गुना ज्यादा खबरें सोशल मीडिया पर थीं। सोशल मीडिया में चलने वाली खबरों में ऐसी खबरों की तादाद काफी थी जिन्हें फर्जी माना जा सकता है। इन खबरों के पीछे के सच या झूठ लोग कितना समझ पाते हैं यह लोगों की स्वयं की बुद्धि क्षमता (आई.क्यू.) पर निर्भर करता है। बहुत से लोग यह मानते हैं कि ऐसी खबरें उनके लिए केवल मनोरंजन के साधन से ज्यादा कुछ भी नहीं है। और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पूरी गंभीरता से इन खबरों को पढ़ते हैं, इन्हे सच मानते हैं और आगे फॉरवर्ड कर देते हैं। (हाल ही कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह को भी इसका कोप झेलना पड़ा था।) यहीं से गड़बड़ी शुरू होती है। जब इन खबरों को गंभीर मानने वालों की संख्या कुछ ज्यादा हो जाती है तो ये खबरें बहुत जल्दी वायरल हो जाती हैं। और इसके नतीजे कुछ भी हो सकते हैं।
असली जैसी दिखने वाली फेक न्यूज बनाने में माहिर अमरीका के पॉल होर्नर ने तो दावा किया था ट्रंप की जीत का मुख्य कारण उनकी ओर से प्रसारित फर्जी खबरें ही रही हैं। होर्नर का अभी 18 सितम्बर को निधन हो गया। ‘पोप ने ट्रंप का समर्थन किया’, ‘ओबामा समलैंगिक और मुस्लिम समर्थक हैं’ जैसी कुछ खबरें तो चुनाव के समय वायरल हो गई थीं। होर्नर का कहना था की वे व्यंग्य के रूप में ऐसी खबरें प्रचारित करते थे। निस्संदेह असली-सी दिखने वाली ऐसी फर्जी खबरें जनमानस को काफी प्रभावित कर सकती हैं। खासतौर से भारत जैसे देश में जहां इंटरनेट मीडिया नया-नया ही है और जहां सोशल मीडिया पर प्रचारित हर सूचना को सच्ची मानने वालों की तादाद बहुत ज्यादा है।
भारत में इसे सरकारों का अहंकार ही माना जाना चाहिए कि उन्होंने फर्जी खबरों को प्रसारित करने वाले सोशल मीडिया को बहुत हवा दी। सच्ची खबरों के सामने फर्जी खबरों को इतना बड़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है कि सच्ची खबरों से ज्यादा लोग फर्जी खबरों पर विश्वास करने लगते हैं। जब तक वे सच को पहचान पाते हैं, बहुत देर हो चुकी होती है। इससे सरकारों के दो उद्देश्य पूरे होते हैं। पहला तो सरकार पर अंकुश रखने वाले मेनस्ट्रीम मीडिया की ताकत कमजोर हो जाती है। कुछ अपवाद छोडक़र ज्यादातर अखबारों में कलम की धार कुंद हो जाती है। जिससे सरकारों को निरंकुश होकर काम करने की छूट मिल जाती है। दूसरे, सरकारें स्वयं झूठ फैलाने के लिए सोशल मीडिया कर्ताओं का सहारा लेती हैं। एक झूठ को सौ बार फैलाकर उसे सच के सामने खड़ा कर दिया जाता है।
अजीब स्थिति तो तब बन जाती है जब जिस सोशल मीडिया का बाजार मनगढं़त खबरें फैलाने के लिए तैयार किया जाता है वही सरकार के लिए मुसीबत बन जाता है। होना तो यह चाहिए कि सोशल मीडिया को तब तक गंभीरता से नहीं लिया जाए जब तक कि उस पर संविधान की नकेल न हो। कानून के बंधन से मुक्तस्वच्छंद मीडिया की तुलना उस बहरूपिया से की जा सकती है जिसके छद्म वेश से भ्रमित लोग उसे भगवान का दर्जा दे देते हैं।
इसका अन्तिम भाग कल पढि़ए ‘न्यूज अराउंड’ पृष्ठ पर
Published on:
08 Oct 2017 12:43 pm
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