
कम होती प्रजनन दर से अगले तीन दशक बाद भारत में कार्यशील आबादी के घटने और बुजुर्ग आबादी के 13 से 15 प्रतिशत तक बढऩे का अनुमान लगाया गया है। जन्म दर में गिरावट निश्चित रूप से देश में आयु संरचना को तो बदलने वाली होगी ही, आने वाले दशक हमारे सामाजिक व आर्थिक ढांचे को भी गहराई से प्रभावित करने वाले होंगे। इसलिए नीति निर्माता, समाज व परिवार सभी को मिलकर आने वाली चुनौतियों के मुकाबले की तैयारी करनी होगी। सबसे बड़ी चुनौती बुजुर्ग आबादी को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की होगी, जिसमें वे किसी पर बोझ बन कर नहीं रहें और सम्मान का जीवन बिता सकें। जनसंख्या को लेकर नीति बनाने का काम शासन के हाथ में है इसीलिए कभी बढ़ती आबादी और कभी घटती आबादी को लेकर नीति निर्धारण का काम हमारे यहां भी होता रहा है।
यह भी सच है कि बढ़ती महंगाई व शिक्षा-स्वास्थ्य पर बढ़ते खर्च, छोटे परिवार को महत्व देने की प्रवृत्ति आदि सभी कारक आबादी लेकर बदलती तस्वीर के लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन बुजुर्ग आबादी बढऩे की स्थिति में आज हमारी सबसे बड़ी ताकत बनी युवा आबादी को भी जिम्मेदारी का भाव ज्यादा वहन करना होगा। वैसे भी हमारे देश में बुजुर्गों की देखभाल का दायित्व परिवार पर ही होता है। वृद्धाश्रम का विचार हमारी संस्कृति के अनुकूल नहीं है। लेकिन अलग-अलग कारणों से उपेक्षित व असुरक्षित माहौल में जीवन बिता रहे बुजुर्गों की संख्या कम नहीं है। इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि छोटे परिवार रखने की प्रवृत्ति, महिलाओं की बढ़ती कार्य भागीदारी से संयुक्त परिवार के ढांचे में बदलाव आया है। लेकिन यह भी समझना होगा कि बुजुर्ग केवल देखभाल के पात्र ही नहीं बल्कि अनुभव व मार्गदर्शन के बड़े स्रोत भी हैं। नीति निर्माताओं को ऐसी नीति पर काम करना होगा जिसमें बुजुर्ग खुद को सुरक्षित महसूस करें। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की ताजा रिपोर्ट को भी इस चिंता से जोडऩा होगा, जिसमें कहा गया है कि भारत में वर्ष 2024 में हुई लगभग आधी मौतें बिना प्रशिक्षित चिकित्सकीय देखभाल के हुई। इनमें बड़ी संख्या में मौतें घर पर या औपचारिक स्वास्थ्य सेवाओं के बाहर हुई हैं। उम्र बढऩे के साथ-साथ सेहत से जुड़ी समस्याएं अधिक होती है। बुजुर्गों के लिए पेंशन व बीमा जैसी सुविधाओं के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों तक में विशेष सुविधाएं विकसित करनी होंगी। आबादी को लेकर जो तस्वीर सामने आई है उसे सिर्फ सांख्यिकीय परिवर्तन मानना ही ठीक नहीं होगा।
यह बदलाव सांस्कृतिक, नीतिगत और पारिवारिक जीवन से जुड़ा हुआ है। बुजुर्गों की देखभाल परिवारों से जुड़ी भावनात्मक जिम्मेदारी ही नहीं बल्कि संगठित सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा बननी चाहिए जिसमें हमारी सांस्कृतिक परंपराओं की अनदेखी न हो।
Published on:
08 Jun 2026 04:17 pm
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