हर समस्या का सीधा-सरल हल थे सोली सोराबजी

सोली सोराबजी बहुचर्चित केशवानंद भारती मामले में रहे थे न्यायविद् नानी पालखीवाला के सहयोगी थे।

By: विकास गुप्ता

Updated: 01 May 2021, 08:05 AM IST

संजय हेगड़े

सोली सोराबजी वह शख्सियत थे, जिनकी उत्कृष्टता अदालतों तक ही सीमित नहीं थी। मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय संबंध और जैज संगीत पर भी उनकी मजबूत पकड़ थी। उनके मित्र और जानकारों का एक विशाल समूह था, जिन्हें सदा उनसे स्नेह मिलता रहा। वे जानते थे कि किस काम के लिए किससे बात करनी है और किसके निमित्त करनी है। उन्हें विधि व्यवसाय में प्रतिभा की अच्छी परख थी और जब वे भारत के एटॉर्नी जनरल थे, उन्होंने कई जूनियरों को अपने साथ जोड़ा। मुझे भी थर्ड जज, अरूंधति रॉय अवमानना और नवीं अनुसूची केस (आइ.आर. कोएल्हो) में उनके साथ काम करने का सौभाग्य मिला। उनकी सबसे बड़़ी खूबी यह थी कि वे अदालत में जो रिपोर्ट प्रस्तुत करते, उससे ऐसा लगता था मानो यह उस समस्या विशेष का सीधा, सरल और स्पष्ट समाधान था।

सोली का जन्म 1930 में एक संपन्न पारसी परिवार में हुआ। उन्होंने कानून को अपना कार्य क्षेत्र चुना और 1953 में सर जमशेदजी कांगा के चैम्बर में शामिल हुए। 1970 के बड़े कानूनी मामले सोली और फाली दोनों को सुप्रीम कोर्ट तक ले आए और दिल्ली में उनका नया व्यावसायिक सफर शुरू हुआ। केशवानंद भारती केस में सोली, नानी पालखीवाला के साथ थे, जिस मामले ने देश को 'मूल ढांचे' का सिद्धांत दिया। विभिन्न मामलों के अदालती फैसलों को लेकर लिखे गए सोली के आलेख मूल फैसलों से ज्यादा पढ़े गए। आपातकाल के दिनों में सोली मानवाधिकारों के कड़े पक्षधर बन कर सामने आए और नागरिक स्वतंत्रता संबंधी मामलों में 'प्रो-बोनो' (लोक-कल्याणार्थ) सेवाएं दीं। आपातकाल के विरोध में उन्होंने कई विधि सम्मेलन किए और बॉम्बे बार का नेतृत्व किया।

मोरारजी देसाई सरकार के दौरान सोली सॉलिसिटर जनरल बने। मेनका गांधी पासपोर्ट मामले में उनके कौशल का ही परिणाम था कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 को विस्तृत किया गया। 1989-90 में वी.पी. सिंह सरकार के समय वह भारत के एटॉर्नी जनरल बने। 1998-2004 के बीच बतौर अटॉर्नी जनरल अंतिम पारी के दौरान उन्हें सुप्रीम कोर्ट के कई मामलों को कुशलता से सुलझाते देखा गया। इसी दौरान उनके सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे से मतभेद भी हुए, जो कभी उनके चैम्बर में जूनियर थे। राम जेठमलानी ने कानून मंत्री का पद छोडऩे के लिए सोली, न्यायाधीश ए.एस. आनंद और अरुण जेटली को जिम्मेदार ठहराया। उनके जीवन का ये वह हिस्सा था, जब उनकी ऊर्जा और उत्साह चरम पर थे।

मार्च 2002 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। एटॉर्नी जनरल पद से हटने के बाद भी सोली ने कई अहम संवैधानिक मामलों में पैरवी की। बी.पी. सिंघल केस में पेश की गई उनकी दलीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना पड़ा कि राज्यपालों को बिना किसी ठोस वजह के बर्खास्त नहीं किया जा सकता। सोली कई अंतरराष्ट्रीय पदों पर भी रहे, जैसे 1997 से संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टर्र और 1998 से संयुक्त राष्ट्र के पक्षपात निरोधक एवं अपसंख्यक संरक्षण उप आयोग के सदस्य। वर्ष 2000 से 2006 के बीच वह हेग की परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के सदस्य भी रहे।

सोली ने अपने एक आलेख में कहा था-'हम सब भगवान के घर जाने के लिए डिपार्चर लाउंज में अपनी फ्लाइट का इंतजार कर रहे हैं।' शुक्रवार को उनकी फ्लाइट आ गई। अलविदा सोली, आप वहां सुरक्षित लैंड करें।
(लेखक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं)

विकास गुप्ता
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