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गांव-गांव में पानी के गीत,मथा जा रहा रेत का समुद्र

पत्रिका समूह के संस्थापक कर्पूर चंद्र कुलिश जी के जन्मशती वर्ष के मौके पर उनके रचना संसार से जुड़ी साप्ताहिक कड़ियों की शुरुआत की गई है। इनमें उनके अग्रलेख, यात्रा वृत्तांत, वेद विज्ञान से जुड़ी जानकारी और काव्य रचनाओं के चुने हुए अंश हर सप्ताह पाठकों तक पहुंचाए जा रहे हैं।

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‘जल है तो कल है’ का नारा हमारे लिए कोई नया नहीं है। लेकिन इसकी परवाह शायद ही किसी ने की हो। पत्रिका समूह के अमृतं जलम् अभियान ने पिछले सालों में हजारों जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का काम जनसहयोग की बदौलत ही किया है। यही जनसहयोग अमृतं जलम् अभियान के तहत आज से जयपुर के रामगढ़ बांध को पुनर्जीवित करने के संकल्प में नजर आएगा। पानी का महत्त्व कितना है यह कुलिश जी ने सत्तर के दशक में राजस्थान के दौरे में नजदीक से महसूस किया। उन्होंने लिखा कि विभिन्न इलाकों में पानी की कमी को लेकर अलग-अलग गीत संवाद बने हुए हैं।
कहते है सभ्यता नदी-घाटियों या नदी किनारे पैदा हुई है, लेकिन वह सभ्यता का कौनसा तत्व या लक्षण है जो रेगिस्तान के इस इलाके में नहीं है। यह वह सभ्यता और संस्कृति है जो बिना पानी के ही बालू रेत में पैदा हुई है। देवताओं ने अमृत-कलश निकालने के लिए समुद्र-मंथन किया था, परन्तु राजस्थान के चूरू जिले में पानी की एक-एक बूंद के लिए रेत का समुद्र मथा जा रहा है। जिले के गांव-गांव में पानी की एक कहानी है, पानी की कविता है और पानी की एक संस्कृति है। इसी तरह गांव-गांव में पानी के गीत बने हुए हैं। बूचावास को लेकर एक दोहा इस तरह कहा गया है:-
ऊंचो टीबो, सिर घड़ो, तिरया तेरह मास।
नारी सींचे नर पिये, बालूं बूचावास ॥
अर्थात ऊंचा टीला है, सिर पर पानी से भरा घड़ा है और पेट में तेरह महीने का गर्भ है। स्त्री पानी लाती है और पुरुष पीते हैं, ऐसे गांव को आग लगा दूं। पानी भरने की कठोर यंत्रणा इस तरह से एक महिला के मुंह से निकली है। तेरह मास का गर्भ इसलिए कि प्रसव के लिए समय ही नहीं मिला।
गाजूवास-गडाणसी नाम के युगल गांवों के लिए एक लोकोक्ति है-
गाजूवास गडाणसी, पाणी पीयां जाणसी।
टीबां कानी ताणसी, बैठसी ऊंचाणसी॥
गाजूवास-गडाणसी का खारा पानी पीने से ही मालूम पड़ेगा। पीते ही इसका पता चलेगा। टीबों की तरफ भागना पड़ेगा और…
आलीड़ै में सूखैड़ो, सूखेड़े में कीच।
एक तमासो म्हे देख्यो, रिणी-चुंगाई बीच॥
अर्थात् तारानगर के रिणी और चुंगाई गांव के बीच की मिट्टी ऐसी है कि पानी पडऩे पर गीली मिट्टी तो गाढ़ी हो जाती है और सूखी मिट्टी कीचड़ बन जाती है। इधर थोड़ी बरसात में भी चना पैदा हो जाता है।
भरतपुर जिले की नदबई पंचायत समिति में एक गांव है भदीरा, जिसके बारे में यह गीत गाया जाता है:-
कजरा बैंवी भूल गई, भदीरा तेरा पानी।
एक नई बहू कहती है कि, भदीरा के कुओं से पानी खींचते वह काजल-टीकी लगाना भी भूल गई। लोगों ने बताया कि २०० फीट गहरे कुएं थे इसलिए लोग नदबई की तरफ अपनी बेटियां देने का तैयार नहीं होते थे।

आबादी के फैलाव ने गला घोंटा
बीकानेर शहर की रचना इस तरह की है कि आसपास की जमीन ऊंची है। शहर के चारों ओर तालाब थे ताकि बरसात में बाहर का पानी सिमटकर इनमें भर जाए। इससे आबादी को पानी मिल जाता था। सूरसागर, जसोलाई, भाटोलाई, गबोलाई, बिन्नाणियों की तलाई, नरसिंह सागर, बागीनाड़ा आदि इसी तरह के तालाब थे। अब आबादी के फैलाव के साथ तालाबों के अगोरों में मकान बन गए। उनकी उपयोगिता वैसी नहीं रही। एक मुसीबत स्थायी तौर पर बनी रह गई कि बरसात के थोड़े से पानी से भी शहर में ढलान के कारण बाढ़ की सी हालत पैदा हो जाती है। अब तालाब या तो गंदगी के घर बने हुए हैं या मुसीबत की जड़, क्योंकि इन तालाबों से पानी शहर की आबादी में घुस आता है। कुछ तालाब तो आबादी के बीच में आ गए हंै।
(कुलिश जी के यात्रा वृत्तांत आधारित पुस्तक ‘मैं देखता चला गया’ से)

…गांव का रिश्ता
गांव का रिश्ता मकान, जायदाद का ही रिश्ता नहीं होता। टोंक जिले का सोडा गांव मेरी जन्मभूमि है। यहां मैं पला हूं और बड़ा हुआ हूं। इसकी मिट्टी में खेला हूं। इसके तालाब में रोज नहाता रहा हूं। नहाने का वह मजा किसी बड़े से बड़े होटल के आलीशान स्वीमिंग पूूल में भी नहीं आ सकता। अपने गांव की बात ही कुछ और होती है। वह खेलना, वह तैरना, पाठशाला में पढऩा, खेतों की रखवाली करना, उगती और कटती फसलों को देखना, कुछ और ही मायने रखता है। मुझे अब तक बचपन की सब बातें हूबहू याद हैं।
(कुलिश जी के आत्मकथ्य पर आधारित पुस्तक ‘धाराप्रवाह’ से)