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संसद में दिए आश्वासन…वादे हैं वादों का क्या

आश्वासन समिति की निगरानी और नियमावली में कुछ कमजोरियां हैं, जिससे मंत्री जिम्मेदारी से बच जाते हैं। समाधान के लिए समिति को अधिक अधिकार और पारदर्शिता जरूरी है, ताकि जनता अपने प्रतिनिधियों के वादों की स्थिति जान सके।

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जयपुर

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Opinion Desk

Feb 10, 2026

Democratic Discussion

डॉ. प्रभात ओझा, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार

महात्मा गांधी का मानना था कि वचन पत्र पर किए गए वादे पूरे न हों, तो ऐसे नोट किसी काम के नहीं होते और उन्हें जलाकर नष्ट कर देना चाहिए। गांधी जी का कथन आजादी के आंदोलन के दौरान का है। स्वाभाविक है कि तब की विदेशी सरकार भारत की जनता के साथ छल करने में लगी थी। स्वतंत्रता के बाद देश के लोगों के सामने इस तरह की दिक्कत नहीं रही। इसमें दो राय नहीं कि एक कल्याणकारी राज्य के दायित्वों के निर्वहन में सरकारें पीछे नहीं रहीं। फिर भी कुछ बिंदु ऐसे हैं, जो संसद के सदनों में आते हैं, जिनका आशय किसी काम को एक निश्चित समय में पूरा करने का आश्वासन हुआ करता है। ऐसे बिंदुओं का लटके रहना अथवा खारिज हो जाना गौरतलब है। प्राय: सदनों के प्रश्नोत्तर काल अथवा बहसों के दौरान सदस्य सवाल उठाते हैं, जिन पर अमल के लिए सरकार की ओर से आश्वासन दिए जाते हैं।

जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक की सरकारों ने देश को दिए अनगिनत वादे निभाए हैं। दुर्भाग्य की बात है कि इसके बावजूद बहुतेरे आश्वासन खत्म हो गए अथवा आज भी भरोसों की लिस्ट में ही हैं। ऐसी लिस्ट हमारे संविधान के अंतर्गत गठित निर्वाचित सदनों के रिकॉर्ड से ही मिलती है। वादे सरकार के मंत्रियों ने सदन के अंदर किए और कुछ समय बाद उन पर मजबूरी बता दी गई। यह रिपोर्ट चिंताजनक है। संबंधित मंत्रियों के कई बड़े वादे, जैसे काला धन की वापसी, भीड़ की हिंसा यानी मॉब लींचिंग, प्रमुख उद्योगपति अडानी की सेबी संबंधी अनियमितता, बांग्लादेश सीमा पर स्मार्ट फेंसिंग यानी तारबंदी और पुलवामा हमले की जांच जैसे वादे बाद में कारण बताकर पूरे नहीं किए गए। इन प्रमुख पांच आश्वासन पूरे नहीं कर पाने के जो कारण बताए गए, उनके तर्क दिए गए। उदाहरण के लिए काला धन के बारे में अनुमान नहीं लगा पाना और पुलवामा हमले की जांच रिपोर्ट का गोपनीय होना शामिल है। अजीब बात है कि इस सूची में इंद्रकुमार गुजराल सरकार के दौरान का वह आश्वासन भी है, जिसमें देश की राजधानी के लिए किराया नियंत्रण अधिनियम को अनुसूचित करना था।

प्रश्न है कि सरकारों के जिम्मेदार मंत्री क्या आश्वासन देते समय उस पर अमल के मामले में बाधाओं से वाकिफ नहीं थे। देश की सुरक्षा मसले को आम नागरिक तक महसूस करता है, फिर करोड़ों लोगों की प्रतिनिधि सभा में लोकलुभावन आश्वासन क्यों दिए जाते रहे हैं। दरअसल, आश्वासन समिति के नियमों में ही कुछ लोच है, जिससे सांसदों से किए गए वादे को पूरा नहीं कर पाने के कारण बताकर मंत्री बच जाते हैं। मंत्रियों की ओर से दिए आश्वासनों पर निगरानी की व्यवस्था ही आश्वासन समिति है। ऐसी समितियों को सरकारी आश्वासन समिति (कमेटी ऑन गवर्नमेंट एश्योरेंस) कहते हैं। सदनों की दूसरी स्थायी समितियों की तरह लोकसभा में 1953 और राज्यसभा में 1972 में ऐसी समितियों का गठन किया गया। लोकसभा में अध्यक्ष और राज्यसभा में सभापति की अध्यक्षता में इन समितियों में शामिल 15 और 10 सदस्यों में कोई मंत्री शामिल नहीं होता। ऐसा इसलिए कि आश्वासन किसी न किसी मंत्री की ओर से ही दिए जाते हैं और उन पर विचार करते समय न्याय हो सके। इसके बावजूद इन समितियों की नियमावली कुछ इस तरह की है कि आश्वासन धरे के धरे रह जाते हैं और संबंधित मंत्री भी जिम्मेदारी से बच जाते हैं। आमतौर पर यह समिति सदन में दिए आश्वासनों की निगरानी करती है और सुनिश्चित करती है कि संबंधित मंत्रालय इसे तीन महीने में पूरा करे। इसके लिए आश्वासन समिति संबंधित विभाग की स्थायी समिति को नोट भेजती है और उससे रिपोर्ट भी मांगती है। फिर आश्वासन समिति अंत में अपनी रिपोर्ट के माध्यम से कार्य की स्थिति बताती है।

गौर करने वाली बात है कि लोकसभा और राज्यसभा की आश्वासन समितियां स्थायी होती हैं और हर साल इसके सदस्य बदल जाते हैं। ऐसी व्यवस्था इसलिए की गई होगी कि निगरानी के मामले में सदस्यों पर कोई दबाव अथवा उनका लगाव प्रभावी नहीं हो सके। फिर आश्वासनों की समयबद्ध पूर्णता पर सवाल क्यों रह जाते हैं? इसके पीछे पहले तीन महीने में आश्वासन पर अमल नहीं होने पर समय-विस्तार अथवा मंत्री का स्पष्टीकरण भी है। संभव है कि राजनीतिक कारणों से संबंधित विभाग का मंत्री बदल जाए किंतु इस कारण सरकार का भरोसा तो नहीं बदला करता। वैसे बहुत कम समय के अंदर मंत्रियों के चेहरे बदलने के मामले नहीं होते। सदनों में अत्यधिक दबाव की स्थिति में सदस्यों को आश्वासन देना और बाद में मजबूरी जता देना रणनीतिक हो सकता है, यह भरोसा कम ही करता है। भरोसे की यह कमी सरकार के मामले में ही नहीं, पूरी संसद के संदर्भ में देखी जानी चाहिए।

मुख्य बात यह कि समाधान क्या है? पहली बात तो यह कि आश्वासन समितियों को यह अधिकार भी मिले कि वह पूरे नहीं हुए मामलों में मंत्री की आलोचना भी कर सके। सिवाय यह कह देने से कि मंत्री ने क्या कहा, बात पूरी नहीं होनी चाहिए। क्या देश के लोगों को यह जानने का हक नहीं है कि उनके प्रतिनिधि किसी गंभीर विषय पर अपनी ही कही बात से मुकर क्यों जाते हैं? अथवा किसी वादे पर अमल में बहुत देर क्यों हो रही है? ऐसी रिपोर्ट न सिर्फ सदस्यों को बल्कि सरकारी प्रकाशन संस्थाओं के जरिए सर्व सुलभ हो। इसके बिना सरकारें अपने काम तो गिनाती रहेंगी, जनता को यह बताने से बचती ही रहेंगी कि किन आश्वासनों पर अमल नहीं हुआ। संसद के दोनों सदनों के कार्य संचालन के लिए बनी स्थायी समितियां अपने दायित्व निर्वहन में कुछ अधिक संजीदगी दिखाएं। सरकारी आश्वासन समिति भी उन्हीं में से एक है। यह तो तय है कि कोई भी निर्वाचित सदस्य सदन में अपना खराब प्रदर्शन नहीं चाहता। जरूरत मजबूत संकल्प की है।