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Indian Economy: गरुड़ पर सवार भारत की वैश्विक आर्थिक उड़ान का संकेत

लेख में भारत की उभरती वैश्विक आर्थिक शक्ति को प्रतीकात्मक रूप से 'गरुड़ पर सवार' बताया गया है। अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौतों, संतुलित कूटनीति और भू-रणनीतिक भूमिका के माध्यम से भारत विश्व व्यापार संतुलन में प्रभावशाली स्थान बना रहा है, जिससे निर्यात और उद्योगों को बड़ा लाभ मिल रहा है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Feb 11, 2026

Indian Economy

Indian Economy

राकेश हरि पाठक - वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार,

भारतीय परंपरा में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति में भगवान विष्णु को सृष्टि के पालक के रूप में देखा गया है। उनका वाहन गरुड़ शक्ति, स्थिरता और गति का प्रतीक है। आज के वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत की भूमिका को यदि प्रतीकात्मक रूप में समझा जाए, तो यह कहा जा सकता है कि भारत गरुड़ पर सवार होकर विश्व आर्थिक संतुलन के संरक्षण की यात्रा पर अग्रसर है।

'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भारतीय दर्शन-परंपरा के आलोक में देखें तो भारत और अमरीका के बीच हुआ नया व्यापार समझौता शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और साझी समृद्धि की भावना को पुष्ट करता है। इस समझौते से भारतीय श्रमशक्ति और संसाधनों के लिए नए अवसर खुलते हैं। अमरीका का राष्ट्रीय प्रतीक 'बाल्ड ईगल' शक्ति और प्रभुत्व का प्रतीक रहा है। संस्कृत में ईगल का अर्थ गरुड़ ही होता है, जो पालक देव का वाहन है। अमरीका संग यह व्यापार समझौता भारतीय निर्यातकों के लिए लगभग 900 अरब डॉलर के विशाल बाजार के द्वार खोलता है।

यह समझौता ऐसे समय हुआ है, जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच भी एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौता संपन्न हुआ है। यूरोपीय संघ एक समूह के रूप में हर वर्ष 3.6 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का आयातक है। भारत ने कुल 4.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक वार्षिक आयात वाले दुनिया के दो शक्तिशाली आर्थिक गलियारों में अपेक्षाकृत कम शुल्क बाधाओं के साथ प्रभावशाली प्रवेश किया है। पिछले वर्ष चीन के राष्ट्रपति की ओर से 'ड्रैगन-एलीफेंट' सहयोग की करते हुए भारत के साथ सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया था। भारत में हाथी का ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक महत्व है। चाणक्य के 'अर्थशास्त्र' में हाथी को राजसत्ता, सैन्य सामथ्र्य और प्रभुत्व का प्रतीक बताया गया है। हाल के वर्षों में हुए अनेक व्यापार समझौतों के साथ भारत की यह चाल वैश्विक पथ पर 'गजराज' की मस्त गति जैसी प्रतीत होती है। 'सोने की चिडिय़ा' संज्ञा वाले मौर्य और चोल काल के बाद भारत एक बार फिर देश आर्थिक वर्चस्व के केंद्र के रूप में उभर रहा है।

बीते वर्षों में अमरीका ने 'मेक अमरीका ग्रेट अगेन' और 'अमरीका फर्स्ट' की नीति के तहत व्यापक टैरिफ लागू किए, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता बढ़ी। इसके विपरीत भारत ने 'मेक इन इंडिया' को केंद्र में रखकर स्वयं को दुनिया की फैक्ट्री के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य तय किया। रूस से तेल खरीद को लेकर लगाए गए अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क और दबावों के बावजूद भारत ने संयम बनाए रखा और वैकल्पिक बाजारों की ओर रुख किया। मजबूती से की गई बातचीत का परिणाम यह रहा कि भारत-ईयू समझौते ने अंतत: अमरीका के साथ संबंधों में भी ठहराव और संतुलन पैदा किया। आज स्थिति यह है कि भारत उन देशों में शामिल है, जिन पर अमरीका का सबसे कम आयात शुल्क लागू है। यह चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश की तुलना में भारत को बड़ा प्रतिस्पर्धात्मक लाभ देता है। 

जहां चीन पर लगभग 34 प्रतिशत और पाकिस्तान पर 19 प्रतिशत शुल्क है, वहीं भारत पर यह लगभग 18 प्रतिशत है। वस्त्र, परिधान, रत्न एवं आभूषण, रक्षा उत्पादन, एयरो पार्ट्स तथा लघु एवं मध्यम उद्योगों को इससे सीधा लाभ मिलेगा। अमरीका की सख्त व्यापार नीति के पीछे चीन का तेज आर्थिक और सैन्य उभार भी एक बड़ा कारण है। इस्पात और धातु क्षेत्रों में चीन की अत्यधिक उत्पादन क्षमता और वैश्विक स्तर पर सस्ते माल की डंपिंग से भारत, यूरोप और अमरीका सभी प्रभावित हुए। इसी कारण पश्चिमी देशों ने चीन के प्रति अपना रुख कड़ा किया।

इस पूरे परिदृश्य में भारत का भू-रणनीतिक महत्व और अधिक स्पष्ट हो जाता है। हिंद महासागर के केंद्र में स्थित भारत उन समुद्री मार्गों की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता है, जिनसे वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसी संदर्भ में क्वाड जैसे मंच अस्तित्व में आए। गलवान जैसी घटनाओं और व्यापारिक दबावों के बावजूद भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेगा। आज वैश्विक क्षितिज पर तिरंगा ऊंचा लहरा रहा है और हर भारतीय का सिर भी गर्व से ऊंचा है।