
मानसिक स्वास्थ्य का रखना होगा खास ध्यान
प्रो. रसाल सिंह, अधिष्ठाता (छात्र कल्याण) जम्मू-कश्मीर विवि
दुनिया की सर्वश्रेष्ठ महिला टेनिस खिलाडिय़ों में से एक जापान की नाओमी ओसाका के एक निर्णय ने विश्व समुदाय का ध्यान मानसिक रोगों की व्यापकता की ओर खींचा है। उन्होंने प्रतिष्ठित फेंच ओपन टेनिस प्रतियोगिता से हटने का निर्णय करके सबको चौंका दिया है। नाओमी ने यह निर्णय मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण किया है। इससे पहले बॉलीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्री दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा भी लम्बे समय तक मानसिक अवसाद की स्थिति में रहने का खुलासा कर चुकी हैं। इन तीनों ही महिलाओं का यह खुलासा साहसिक और सराहनीय है। इससे मानसिक स्वास्थ्य भी चर्चा और चिंतन के केंद्र में आया है, जिसकी प्राय: उपेक्षा की जाती रही है। मानसिक बीमारियों को एक 'टेबू' माना जाता रहा है। इसलिए कोई भी न तो इनके बारे में खुलकर बात करना चाहता है और न ही ठीक से इलाज कराना चाहता है। मुश्किल यह है कि अधिकतर लोग मानसिक बीमारियों को छिपाते हैं, क्योंकि मानसिक बीमार व्यक्ति को बहुत आसानी से 'पागल' करार देकर गलत नजर से देखा जाता है। यह स्थिति बदलना आवश्यक है।
कोरोना काल में भारत ही नहीं, वरन् दुनिया में मानवीय जीवन, आर्थिक गतिविधियों एवं संसाधनों की अपूर्व क्षति हुई है। इसके अलावा पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद, रिश्ते-नाते और दैनंदिन जीवन भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। जीवन-चक्र के अचानक थम जाने से पिछले डेढ़ साल में मानसिक व्याधियों में भी वृद्धि हुई है। कोरोना से पहले भी मानसिक बीमारियों से ग्रस्त लोगों की संख्या में वृद्धि हो रही थी। कोरोना आपदा ने इस संकट को ज्यादा व्यापक और भयावह बना दिया है। समाज का बहुत बड़ा हिस्सा आज मानसिक रोगों की चपेट में है।
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-2015-16 के अनुसार भारत में लगभग 15 करोड़ लोगों को मानसिक इलाज, संबल और सहायता की आवश्यकता थी। मुश्किल यह है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं और चिकित्सकों का अभाव है। लगभग एक लाख जनसंख्या के लिए मात्र एक मनोचिकित्सक ही उपलब्ध है। यह सचमुच चिंताजनक स्थिति है। कोरोना आपदा के दौरान यह समस्या कई गुना बढ़ गई है। समूचा स्वास्थ्य ढांचा कोरोना के इलाज में लगा हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी चिंता व्यक्त की है कि कोरोना संकट ने 93 प्रतिशत गंभीर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को ठप कर दिया है, जबकि पहले की तुलना में मानसिक बीमारियों में लगभग तीन गुना वृद्धि हुई है। इस अपूर्व संकट-काल में खुद डॉक्टर और अन्य चिकित्साकर्मी भी मानसिक व्याधियां झेलने को अभिशप्त हैं। महामारी काल में लोगों की मानसिक व्यथा-कथा सुनने और समस्या को सुलझाने की फुर्सत बहुत कम है।
दुनिया को और खास तौर पर भारत देश को भावी मानसिक स्वास्थ्य-संकट से निपटने की तैयारी प्राथमिकता के आधार पर करने की आवश्यकता है। ऐसे ही मानसिक स्वास्थ्य संकट का सामना स्पेनिश फ्लू (1918-20) के दौरान और बाद में भी करना पड़ा था। हालांकि, उस समय मानसिक स्वास्थ्य के बारे में लोगों में जानकारी कम थी और जागरूकता का अभाव था। करीब 100 साल बाद आज स्थिति तब से थोड़ी बेहतर तो है, लेकिन अभी इस दिशा में बहुत काम करने की आवश्यकता है।
मानसिक रूप से स्वस्थ बने रहने के लिए हमें सामाजिकता और आध्यात्मिकता को भौतिकता और तकनीकी से ज्यादा तरजीह देनी होगी। परिवार, पास-पड़ोस और प्रकृति से जुड़कर मानसिक स्वास्थ्य-संकट से सफलतापूर्वक लड़ाई लड़ी जा सकती है। सहानुभूति, संवेदनशीलता, सामूहिकता, संपर्क, संवाद और संबंध न सिर्फ जीवन को सहज-सरल बनाते हैं, बल्कि मानसिक रूप से भी मजबूत करते हैं।
Updated on:
22 Jun 2021, 8:10 AM IST
Published on:
22 Jun 2021, 8:10 AM IST
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