
मिलावट लाइलाज बीमारी बनती जा रही है तो इसकी वजह यही है कि मिलावटखोरों को न तो कानून का डर है और न ही बदनामी की परवाह। लालच इस कदर कि लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने से भी नहीं चूकते। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) की यह ताजा रिपोर्ट चौंकाने वाली है, जिसमें कहा गया है कि देश में दूध का हर तीसरा नमूना मानकों पर खरा नहीं उतरता। दूध में मिलावट सिर्फ सेहत से जुड़ा सवाल ही नहीं है, बल्कि उपभोक्ताओं को धोखा देने व उनकी जान से खेलने का अक्षम्य अपराध है, जिसे रोकने के लिए सिर्फ कानून बना देना ही काफी नहीं, सख्ती बरतनी होगी।
एक दौर था जब हमारे देश के लिए कहा जाता था कि यहां दूध-घी की नदियां बहती हैं। लेकिन अब दूध में पानी ही नहीं, बल्कि यूरिया, डिटर्जेंट और दूसरे खतरनाक रसायन डाले जा रहे हैं। चिंता की बात यह भी है कि दूध में मिलावट का यह दुष्चक्र लोगों को सेहतमंद बनाने के बजाय कई गंभीर रोगों से घेर रहा है। कृषि और पशुपालन में आगे समझे जाने वाले हरियाणा, उत्तरप्रदेश और पंजाब सरीखे प्रदेशों में दूध के नमूने फेल होने की दर दूसरे राज्यों के मुकाबले ज्यादा है। मिलावटखोरों पर प्रभावी अंकुश न होना उनके लालच को और बढ़ा रहा है। चिकित्सक लंबे समय से कह रहे हैं कि मिलावटी पदार्थों का सेवन किडनी व लिवर की बीमारियों के साथ पाचन तंत्र को कमजोर करने वाला होता है।
हैरत की बात यह है कि कोई दूध मानकों पर खरा उतरने वाला है या नहीं, इसको जांचने की पुख्ता व्यवस्था ही नहीं है। सरकारी स्तर पर जब-तब दूध के नमूनों की जांच होती है तो उनमें भी प्रक्रियागत खामियां इतनी है कि नतीजे ही ठीक से नहीं आ पाते। दूध और डेयरी उत्पादों में मिलावट पर तो सरकारी सिस्टम की चुस्ती की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि पौष्टिकता की जगह लोगों को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां तक मिलावट की वजह से होने का खतरा बना रहता है। एफएसएसएआइ ने भले ही दूध विक्रताओं के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता कर दी है लेकिन लाइसेंस की अनिवार्यता मिलावट रोकने की गारंटी नहीं हो सकती। लोग अपने घरों पर ही दूध की जांच कर सकें इसकी आसान प्रक्रिया की जानकारी उन तक पहुंचानी होगी। लाइसेंस प्रक्रिया भी कहीं इंस्पेक्टर राज को बढ़ावा देने वाली नहीं बन जाए, इसका भी ध्यान रखना आवश्यक है।
पिछले चार साल में दूध के 1.2 लाख नमूनों में 47 हजार से ज्यादा का मिलावटी होना, जितना चिंताजनक है उससे भी बड़ी बात यह है कि इनमें सजा और जुर्माना आधे लोगों पर भी नहीं हो पाया। जाहिर है कि लाइसेंस व्यवस्था और ठोस कानून ही काफी नहीं, बल्कि जांच प्रक्रिया में तेजी और सजा के मामलों में सख्ती ही मिलावटखोरों पर अंकुश लगा सकेगी।
Updated on:
16 Mar 2026 01:36 pm
Published on:
16 Mar 2026 01:35 pm
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