अब समय आ गया है कि न सिर्फ क्रिकेट, बल्कि सभी खेलों में इस तरह का भेदभाव समाप्त किया जाए। लैंगिक असमानता मानसिकता का परिणाम है। इसलिए मानसिकता में बदलाव करना आवश्यक है।
विभिन्न क्षेत्रों और विधाओं में लैंगिक समानता स्थापित करने की दिशा में अभी काफी काम किया जाना बाकी है। देश इस दिशा में धीरे-धीरे ही सही, आगे बढ़ रहा है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि महिलाओं की प्रीमियर लीग (डब्ल्यूपीएल) के लिए आगामी 13 फरवरी को होने वाली नीलामी में खिलाड़ियों की बोली लगाते समय इस बात का ध्यान रखा जाएगा। डब्ल्यूपीएल का आयोजन मुंबई में होना है। भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने अपने शानदार प्रदर्शन से यह साबित कर दिया है कि वह किसी भी मामले में पुरुष क्रिकेट टीम से कमतर नहीं है। अभी हाल ही में अंडर-19 क्रिकेट टीम ने पहला विश्व कप जीतकर आने वाले दिनों की बुलंद तस्वीर पेश कर दी है। अब बारी इस खेल में निवेश करने वालों की है। जिस तरह आइपीएल ने देश में खिलाडिय़ों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उसी तरह का संबल महिला खिलाडिय़ों को भी मिले तो खेलों का भविष्य और चमक सकता है।
महिला क्रिकेट खिलाडिय़ों के वेतन को पुरुषों के बराबर करने की घोषणा कर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने पिछले साल अक्टूबर में लैंगिक भेदभाव समाप्त करने के अपने इरादे जता दिए थे। डब्ल्यूपीएल की घोषणा के बाद पांच सीजन (2023-27) के लिए मीडिया अधिकार 951 करोड़ रुपए में नीलाम हुए। उसके कुछ दिनों बाद पांच टीमों की नीलामी से बीसीसीआइ को 4,670 करोड़ रुपए हासिल हुए। इसमें अडानी स्पोट्र्स ने 1,289 करोड़ की बोली लगाकर अहमदाबाद की टीम को खरीदा था। महिला क्रिकेट के प्रोत्साहन की दिशा में इसे मील का पत्थर माना जा सकता है, लेकिन पुरुषों की आइपीएल से तुलना करें, तो पाते हैं यह ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है। आइपीएल के मीडिया अधिकार ही सिर्फ 48,390 करोड़ रुपए में बिके थे। इतनी ऊंची बोली का अनुमान बीसीसीआइ ने भी नहीं लगाया था।
व्यक्तिगत स्पर्धा वाले खेलों कुश्ती, बॉक्सिंग, बैडमिंटन और वेटलिफ्टिंग में महिला खिलाडिय़ों ने काफी नाम और दाम कमाया है, लेकिन टीम इवेंट वाले खेलों में महिला खिलाडिय़ों की आर्थिक स्थिति कभी अच्छी नहीं रही। क्रिकेट इसका जीवंत उदाहरण है कि कई विश्वस्तरीय महिला खिलाडिय़ों को भी वैसा आर्थिक सहयोग नहीं मिला, जैसा पुरुष खिलाड़ियों को मिलता रहा है। अब समय आ गया है कि न सिर्फ क्रिकेट, बल्कि सभी खेलों में इस तरह का भेदभाव समाप्त किया जाए। लैंगिक असमानता मानसिकता का परिणाम है। इसलिए मानसिकता में बदलाव करना आवश्यक है।