
भारतीय नौकरशाही की एक दुर्भाग्यपूर्ण ख्याति है, न सिर्फ नागरिकों तथा निवेशकों के लिए बल्कि खराब जनसेवा तथा निम्न उत्पादकता के लिए भी। फिर भी इन बातों की अनदेखी की जाती है कि सरकारी कर्मचारियों (विशेष रूप से वरिष्ठ स्तर पर) को उनके निजी समकक्षों की तुलना में काफी कम वेतन मिलता है। 25 वर्ष से अधिक के अनुभव वाले सरकारी डॉक्टर को 2.1 से 2.8 लाख रु. मासिक औसत वेतन मिलता है जबकि निजी क्षेत्र में 15 वर्ष के अनुभव वाले डॉक्टर उससे दोगुना कमाते हैं।
भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन का वार्षिक वेतन 31 लाख रु. है जबकि एचडीएफसी के प्रबंध निदेशक आदित्य पुरी का वार्षिक वेतन 9.73 करोड़ रु. है। एक दशक तक वेतन स्थिर रहने के बाद एक आम ड्राइवर का मासिक वेतन 10,000 रु. से बढ़कर मात्र 25,700 रु. होगा। हम सरकारी कर्मचारियों से उत्कृष्ट सेवा की आशा करते है पर फिर भी उन्हें अच्छा वेतन देने को नकार देते है।
जहां गैर-मौद्रिक लाभ काफी अधिक बने हुए हैं, वहां वेतन को अभी तक भी निष्पादन से नहीं जोड़ा गया है। 7वें वेतन आयोग की सिफारिश के बिना वार्षिक वेतन वृद्धि 3 प्रतिशत बनी हुई है और महंगाई भत्ता इसे बढ़ाकर 8 प्रतिशत कर देता है, जो शीर्षस्थ प्रतिभा के लिए कोई प्रोत्साहन प्रतीत नहीं होता। 7वें वेतन आयोग ने सिफारिश की है कि कार्य न करने वालों को 20 वर्ष की सेवा के बाद हटा दिया जाएगा।
हम कम कार्य करने वाले या औसत कर्मचारी को अत्यधिक वेतन देना जारी रखे हुए हैं, जबकि शीर्ष कार्य निष्पादन वालों को कार्य करने के लिए लगभग न बराबर प्रोत्साहन दिया जाता है। इसकी तुलना में, अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाएं सरकारी कर्मचारी के वेतन बेंचमार्किंग के लिए एक कार्य तथा परिवार आधारित ढांचे को लागू करती हैं।
सिंगापुर में हर साल टॉप विद्यार्थियों को विदेशी विश्वविद्यालयों में पढऩे के लिए सरकारी पैसे से छात्रवृत्तियां दी जाती हैं। वापस लौटने पर इन विद्यार्थियों का प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा में शामिल करने के लिए आकलन किया जाता है, जिनमें से श्रेष्ठ स्थायी सचिव और अंतत: सरकारी मंत्री बनते हैं। हर साल ऐसे अधिकारियों का निष्पादन के लिए मूल्यांकन किया जाता है, जिसमें से बड़ी संख्या में छंटनी करके नए अधिकारियों को लाया जाता है।
सरकारी कर्मचारियों के लिए वर्तमान सीमित कार्यनिष्पादन मूल्यांकन प्रणाली की कई सीमाएं हैं, इसमें बहुत कम मात्रात्मक लक्ष्य हैं। यदि कोई हो, तो उन लक्ष्यों के प्रति उपलब्धि के संबंध में बहुत कम मूल्यांकन किया जाता है। अच्छे निष्पादन की परिभाषा व नौकरशाही से प्रत्याशित निष्पादन के स्तर के संबंध में भ्रम बना हुआ है जबकि अस्पष्ट निष्पादन मानकों और वरिष्ठ अधिकारियों व राजनेताओं की ओर से पक्षपात के चलते प्रभावित किया जा सकता है।
वर्तमान प्रक्रिया में केवल प्रतिकूल ग्रेडिंग पर विचार किया जाता है (पूर्ण वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट को कर्मचारी को दिखाया नहीं जाता), जिससे सरकारी कर्मचारी को वर्तमान निष्पादन स्तर के संबंध में अस्पष्ट जानकारी होती है। हमारा ध्यान रेटिंग तथा राजनीतिक रूप से प्रेरित मूल्यांकन के बजाए, निष्पादन की आयोजना बनाने, नियमित रूप से 360 डिग्री समीक्षा और प्रेरणा तथा उच्चतर निष्पादन को प्रेरित करने के लिए एक प्रशिक्षण तंत्र बनाने पर होना चाहिए। मूल्यांकन रिपोर्ट की प्रकृति अधिक सलाह देने वाली तथा अधिक पारदर्शिता वाली होनी चाहिए। विस्तृत कार्य योजनाओं और निष्पादन की वर्ष के मध्य में समीक्षाओं को अपनाया जाना चाहिए।
सरकारी कर्मचारी की वेतन वृद्धि वाला तंत्र त्रुटिपूर्ण है। काफी विलंब के बाद आने वाले 7वें वेतन आयोग ने वेतनों में 23.5 प्रतिशत की वृद्धि की है। राजनीतिक कदम के चलते की गई कार्रवाई से होने वाली इस वृद्धि का महत्वपूर्ण व्यष्टि अर्थशास्त्रीय प्रभाव होगा, जिसका वित्त वर्ष 2017 के लिए 2.5 लाख करोड़ रु. होने का अनुमान है। इतनी बड़ी वृद्धि से कुछ ही वर्षों में सरकार की वित्तीय क्षमता गड़बड़ा सकती है। छठे वेतन आयोग के बाद वर्ष 2009-10 में सरकार के वित्तपोषण में वेतन, भत्ते तथा पेंशन की हिस्सेदारी बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद की 2.3 प्रतिशत हो गई थी जबकि वर्ष 2001-02 में यह सकल घरेलू उत्पाद की 1.9 प्रतिशत थी।
राज्य विशेष रूप से प्रभावित होंगे-जहां केंद्र सरकार के लिए राजस्व व्यय में वेतन तथा भत्तों की हिस्सेदारी 13 प्रतिशत थी (14वां वित्त आयोग), राज्यों का अनुपात वर्ष 2012-13 में 29 प्रतिशत से 79 प्रतिशत के मध्य था। इसके अतिरिक्त, वन रैंक वन पेंशन के सिद्धांत का विस्तार करके इसे सभी असैन्य कर्मचारियों पर लागू किए जाने की संभावना से पेंशन पर काफी मुद्रास्फीति प्रभाव होंगे। निजी क्षेत्र के समान धीरे-धीरे वेतन वृद्धि की एक प्रक्रिया एक अधिक स्थिर विकल्प हो सकता है। हम एक दशक पुराने वेतन आयोग को जारी नहीं रख सकते है- हमें कार्य बल में बीच में प्रवेश कराने, हमारे कार्मिक नियोजन को पुन: ढांचाबद्ध करने पर ध्यान देते हुए वेतन को सीधे निजी क्षेत्र तथा उत्पादकता प्रत्याशाओं से जोड़ सकते है।
केन्द्र सरकार में 18 प्रतिशत रिक्तियां हैं। हमारी लोक सेवाओं को डॉक्टर, शिक्षक, इंजीनियर अधिक और डाटा एंट्री बाबुओं की कम संख्या में जरूरत है। प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा सुझाए गए सुधारों को लागू करना पहला कदम होना चाहिए।
वरुण गांधी, सांसद
सुल्तानपुर से लोकसभा सदस्य हैं। भाजपा के सबसे युवा महासचिव बने। स्तंभकार हैं और कविता लेखन भी करते हैं।
बाधारहित उत्पादकता देने के लिए सरकारी विभागों की नियमित आवधिक जांच हो, जिसमें समयबद्धता, ग्राहक संतुष्टि और लागत प्रभावोत्पादकता पर फोकस हो। बेहतर वेतन के माध्यम से, बेहतर लोक सेवा डिलीवरी हमारी स्वभाविक प्रकृति होनी चाहिए।
Published on:
10 Aug 2016 03:28 am
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