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मनमाना न हो अधिकारों का इस्तेमाल

मुकदमों का बंटवारा इस तरह होना चाहिए कि यह प्रतीत हो सके कि जो बैंच सुनवाई कर रही है वह ही उस मुकदमे की सुनवाई के लिये सर्वोत्तम बैंच है।

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Sunil Sharma

May 07, 2018

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- शिव कुमार शर्मा, पूर्व न्यायाधीश

वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने एक न्यायिक निर्णय में यह अवधारित कर दिया था कि चीफ जस्टिस मास्टर ऑफ रोस्टर है अर्थात जो मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत होता है वह सुनवाई के लिये किस बैंच के समक्ष जाएगा इसका निर्धारण चीफ जस्टिस ही करते हैं। लेकिन क्या चीफ जस्टिस को मिले इस अधिकार का इस्तेमाल स्वेच्छाचारी तरीके से किया जा सकता है? यह एक गंभीर प्रश्न है। सुप्रीम कोर्ट के जज एक लघु भारत की सृष्टि करते हैं। वे कानून में निष्णात तो होते ही हैं साथ ही देश के प्रत्येक संवेदनशील मुद्दे को लेकर गंभीर भी होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के दौरान प्रत्येक जज जिस भी पृष्ठभूमि से आते हों उनके साथ कुछ न कुछ खट्टे - मीठे अनुभव भी जुड़े होते हैं। चीफ जस्टिस ‘फस्र्ट एमंग्स्ट इक्वल्स’ अर्थात समान में प्रथम होते हैं। उनका कार्य व्यवहार इस प्रकार होना चाहिए कि कोई उन पर उंगली न उठा सके। कहते भी हैं कि न्याय होना ही नही चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिये। न्यायपालिका की स्वतंत्रता अक्षुण्ण रखना चीफ जस्टिस का दायित्व होता है। मुकदमों का बंटवारा इस तरह होना चाहिए कि यह प्रतीत हो सके कि जो बैंच सुनवाई कर रही है वह ही उस मुकदमे की सुनवाई के लिये सर्वोत्तम बैंच है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में हुआ घटनाक्रम दुर्भाग्यपूर्ण है। लोकतंत्र के लिये स्वतंत्र न्यायपालिका होना पहली शर्त होती है।

कोई भी निरंकुश शासक इस मत का नहीं होता कि न्यायपालिका स्वतंत्र रहे। सुप्रीम कोर्ट में न कोई जज वरिष्ठ होता है न कनिष्ठ। लेकिन कुछ को हो सकता है कि चीफ जस्टिस नापसंद भी करें। इसका यह अर्थ यह तो नहीं है कि क्रमानुसार ऊपर आने वाले जजों को उपेक्षित कर महत्वपूर्ण मुकदमे भी उन जजों को सुनवाई के लिए आवंटित कर दिए जाएं जिनकी विचारधारा को लेकर अफवाहों का बाजार गर्म रहता है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के चार जजों का दायरे से बाहर आकर यह कहना कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में है, एक विस्फोटक स्थिति है।

इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस पार्टी ने अन्य विपक्षी पार्टियों से मिल कर चीफ जस्टिस के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। प्रस्ताव खारिज कर दिया गया पर न्यायपालिका पर नीले निशान तो पड़ ही गए। अब भी वक्त है। चीफ जस्टिस को सुप्रीम कोर्ट के जजों के साथ बैठकर सबको विश्वास में लेना होगा। देश को यह सन्देश देना चाहिए कि वे विभाजित नहीं हैं।