
supreme court judge deepak mishra
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के दिए कई फैसलों पर दोराय हो सकती हैं। खासतौर पर उनके कार्यकाल के आखिरी एक सप्ताह में दिए गए निर्णयों पर। इनमें समलैंगिकता को छूट, शादी से इतर सम्बन्धों को अपराध के दायरे से हटाना, सबरीमला मन्दिर में हर उम्र की स्त्रियों को जाने की छूट, एससी-एसटी पदोन्नति के लिए आंकड़े जुटाने की अनिवार्यता हटाना और दागी जनप्रतिनिधियों को चुनाव लडऩे से रोकने का कानून बनाने का काम संसद के विवेक पर छोडऩा शामिल है।
इनमें से कई भले अभी निजता और स्वतंत्रता की आड़ में अच्छे लग रहे हों लेकिन दीर्घकाल में भारतीय सभ्यता, संस्कृति और समाज तथा परिवार व्यवस्था के उनसे तहस-नहस होने का खतरा सदैव बना रहेगा। लेकिन कार्यकाल के आखिरी दिन, उन्होंने जो आखिरी निर्णय दिया, वह महत्त्वपूर्ण है। उनके इस निर्णय से बहुत ही अच्छे परिणाम आ सकते हैं, बशर्ते कि, हमारी सरकारें उसे लागू कर पाएं। सरकार चाहे केन्द्र की हो या राज्यों की, सभी की इच्छाशक्ति यहां इसलिए सवालों के घेरे में है क्योंकि न्यायालयों का काम निर्णय देना है। जनहित में उन्हें सख्ती से लागू करने का काम हमारी सरकारों का है।
यह किसी से छिपा नहीं है कि, पिछले बीस सालों में कितने राज्यों के उच्च न्यायालयों और कितनी बार सर्वोच्च न्यायालय ने हड़ताल और बंद को लेकर फैसले दिए हैं। प्रत्येक फैसले में, मांगों के लिए शान्तिपूर्ण प्रदर्शन करने के अधिकार को जोरों से खुला रख गया वहीं इस दौरान तोड़-फोड़ और सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने की न्यायपालिका ने जमकर आलोचना की। क्योंकि सरकारें जनता के वोटों से बनती हैं, इसलिए ऐसे मौकों पर किसी भी बंद-हड़ताल में शामिल ऐसे मुट्ठी भर उपद्रवी तत्त्वों के आगे समर्पण कर देती हैं। सचाई यह है कि, यदि वह ऐसे तत्त्वों से, सख्ती से पेश आए तो अपराधी तत्त्वों में डर भी बैठे और आमजन में ‘व्यवस्था’ के प्रति विश्वास भी जगे। सरकारें ऐसा करती नहीं।
सत्ता में आते ही प्रत्येक राजनीतिक दल, सबसे पहले तो अपने ही राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेता है। इसके बाद नम्बर आता है, उन आन्दोलनकारियों का, जो अपने आन्दोलन के दौरान निडर होकर सरकारी सम्पत्ति की तोड़-फोड़ करते हैं। उसे आग लगाते हैं या फिर जमकर हिंसा करते हैं। ऐसे आन्दोलन राज्य कर्मचारी संगठनों से लेकर किसानों अथवा किसी भी सामाजिक संगठन के हो सकते हैं। यह सब रेल पटरी उखाडऩे तक में नहीं हिचकते। कोई उनसे यह पूछने वाला नहीं होता कि, आखिर ऐसा करके वे किसकी मेहनत से बनी सम्पत्ति को ठिकाने लगा रहे हैं। आखिर सरकारों के पास कोई कुबेर का खजाना थोड़े ही है। वह भी तो जनता की कमाई के पैसे से ही इन परिसम्पत्तियों का निर्माण करती है। तब नुकसान किसका होता है? जनता का। सरकारें और अफसर तो फिर बनाएंगे और फिर कमीशन खाएंगे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि, हमारी सरकारें सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्णय की पृष्ठभूमि में, पुराने तमाम फैसलों को एक साथ सामने रखें और संविधान की शपथ खाकर तय करें कि, उन निर्णयों की भावना को नहीं, पूरे निर्णयों को शब्दश: लागू करेंगे। दूसरी तरफ न्यायालयों को भी अपने निर्णयों को लागू कराने के लिए सख्त होना पड़ेगा। जो लागू नहीं करें या आधे मन से लागू करें, ऐसी सरकारों को दण्डित भी करना होगा। नुकसान की भरपाई राजनेता, राजनीतिक दल या सामाजिक संगठनों से ही नहीं व्यक्तिगत तौर पर सरकार और प्रशासन के मुखिया से भी होनी चाहिए। तभी 70 सालों से, लोकतंत्र के नाम पर हो रहा यह खिलवाड़ रुकेगा।

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