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संदेह नया सियासी औजार है

दिलचस्प बात है कि जिस सरकार ने अर्थव्यवस्था पर अपना सारा ध्यान देने का वादा किया था, वह अब चाहती है कि आम बहस-मुबाहिसों में इस पर बात ही न हो।

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Sunil Sharma

Sep 01, 2018

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- प्रताप भानु मेहता, राजनीतिशास्त्री

सुधा भारद्वाज जैसे मानवाधिकार के कुछ सर्वाधिक विश्वसनीय पैरोकारों के यहां छापेमारी और उनकी गिरफ्तारी भयाक्रांत करने वाला क्षण है। यह ऐसी कायराना, उच्छृंखल और दमनकारी राज्यसत्ता की निशानदेही है जो असहमतों को धमकाने के लिए कोई भी तरीका अपना सकती है। इन मामलों के कानूनी और नागरिक आयामों पर काफी कुछ लिखा जा चुका है, पर ये मुकदमे जिस वक्त में दायर किए गए हैं उसकी राजनीतिक और सांकेतिक अहमियत नजरअंदाज नहीं की जानी चाहिए। ये मुकदमे परस्पर स्वतंत्र नहीं, बल्कि सर्वथा नए व खतरनाक विचारधारात्मक संकुल के गढऩ का हिस्सा हैं।

अतीत में तीन भयावह हकीकतों ने भारतीय राज्य की लोकतांत्रिक वैधता में अवरोध उत्पन्न किए हैं। खुद को यह याद दिलाते रहना कि यूएपीए और राजद्रोह से जुड़े अन्य कानूनों का लगातार दुरुपयोग किया गया है, महज यांत्रिक मामला नहीं है। इन कानूनों का अस्तित्व ही अपने आप में एक कलंक है। किसी भी राजनीतिक दल ने इनका विरोध करने का साहस आज तक नहीं जुटाया। दूसरे, जैसा कि हालिया प्रताडि़त व्यक्तियों में से एक आनंद तेलतुम्बड़े ने अपने लेखन में सटीक कहा है, इस राज्य ने भय पैदा करने की तकनीकों का इस्तेमाल उन लोगों का दमन करने में किया है जो आदिवासियों और दलितों जैसे हाशिये के समूहों की सबसे सक्रिय पैरोकारी करते रहे हैं।

स्थानीय संदर्भों में माओवादी बेशक आतंक का बायस हो सकते हैं, लेकिन माओवाद का जैसा कपटपूर्ण प्रयोग हम करते हैं, उसके बहाने दरअसल अधिकारों पर हाशिये के समुदायों के वास्तविक दावों को अवैध ठहराने तथा उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को राज्य के लिए खतरा बताकर उन्हें कलंकित करने का काम हम करते हैं। तीसरे, कोई भी दल ऐसा नहीं है जो एक स्वतंत्र व विश्वसनीय पुलिसतंत्र के प्रति समर्पित हो अथवा कानून के तंत्र को वह काफ्का के अंधेरे दु:स्वप्न से बाहर निकालने की सोचता हो ताकि असली खतरों को बगैर राजनीतिकरण या पक्षपात के संबोधित किया जा सके। ये सब व्यवस्था पर चिरस्थायी दाग से हैं।

इस सामान्य पृष्ठभूमि के बरक्स कुछ विशिष्ट भी है जो हालिया घटनाक्रम में परिलक्षित होता है। मौजूदा हालात का सबसे ज्यादा चौंकाने वाला आयाम यह है कि ये गिरफ्तारियां और छापे कुछ और भयानक घटने का बहाना हैं द्ग एक स्थायी आंतरिक युद्ध की पैदाइश। यह कहने का एक बहाना, कि यह राष्ट्र तो हमेशा खतरे में ही घिरा रहता है द्ग पहले राष्ट्रविरोधियों से इसे खतरा हुआ, अब शहरी नक्सल से और क्या जाने आगे मनुष्यों से ही इसे खतरा पैदा हो जाए। शाश्वत खतरे में पड़े एक राष्ट्र का विचार दरअसल राज्यसत्ता को अत्यधिक अधिकारों से लैस करने का एक बहाना है। इसी बहाने से आप विरोधियों को गद्दार कह के निशाना बनाते हैं और ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर देते हैं जहां ऐसे ‘मजबूत’ नेतृत्व की अनिवार्यता अपरिहार्य बन जाए जो खतरे का सामना कर सके।

भारत के राजनीतिक दलों कांग्रेस से लेकर तृणमूल तक सभी ने माओवाद के खिलाफ अपने तरीके से कड़ा रुख अपनाया है। इस बार भी उनके खिलाफ अभियान चलाए जा रहे हैं और गिरफ्तारियां हो रही हैं, फिर भी कुछ तो है जो अलग है। इस बार एक विशाल दुष्प्रचार मशीनरी काम कर रही है जो इस खतरे को लगातार सियासी मैकार्थीवाद की शक्ल देने में जुटी है। इसका लक्ष्य ऐसा समाज बनाना है जहां हर कहीं गद्दार दिखाई दें। सत्ता द्वारा देश चलाने के सियासी औजार के रूप में संदेह को स्थापित किया जा रहा है क्योंकि यही संदेह हमें एकजुट होकर राज्य को जवाबदेह करार देने से रोकेगा और हम बतौर नागरिक एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएंगे।

ये गिरफ्तारियां उस क्षण में हुई हैं जब इन समूहों पर बुद्धिजीवियों की संगठित हत्या का आरोप लग रहा था। एक गणराज्य के लिए इससे बेहतर क्या हो सकता है कि जब सामने कोई वास्तविक खतरा खड़ा हो तो उससे बड़ा अतिरंजित खतरा सामने ला दिया जाए? इस उत्क्रमण का दूसरा आयाम थोड़ा व्यापक है द्ग ध्रुवीकरण के रूप में। हम हमेशा से मानते आए कि ध्रुवीकरण तो हिंदू-मुस्लिम मुद्दे से ही पैदा होता है। इसमें कुछ तत्व है, लेकिन एक और ध्रुवीकरण जन्म ले रहा है जो सेकुलर लोगों को तुष्ट कर सकता है और ट्विटर पर तलवार भांज रहे हर शख्स को गौरव का बोध भी करा सकता है। इस ध्रुवीकरण का औजार यह राष्ट्र है।

दिलचस्प बात है कि जिस सरकार ने अर्थव्यवस्था पर अपना सारा ध्यान देने का वादा किया था, वह अब चाहती है कि आम बहस-मुबाहिसों में इस पर बात ही न हो।

यह घोषित आपातकाल भले न हो और आंकड़ों के लिहाज से भी देखें तो मौजूदा दमन आपातकाल में हुए दमन के बरक्स कमजोर ही नजर आएगा। दोनों में हालांकि एक फर्क है। आपातकाल विशुद्ध सत्ता का मामला था। आज जो हम देख रहे हैं वह कहीं ज्यादा प्रच्छन्न और कपटपूर्ण परिघटना है। एक ऐसा मनोवैज्ञानिक संकुल निर्मित किया जा रहा है जहां हर कोई गद्दार है। यह सत्ता केवल हमारी देह को कैद करना नहीं चाहती, बल्कि हमारी रूहों को भी कुंद कर देने की मंशा रखती है। वक्त का तकाजा है कि अब अदालतें और नागरिक समाज ही इस सत्ता को चुनौती दें।