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Patrika Opinion: संसद की नई इमारत से देश को अब नई उम्मीदें

हमारे सांसदों को समझना चाहिए कि संसद में वे जो कुछ बोलते हैं, उसकी गूंज देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी सुनाई पड़ती है।

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Nitin Kumar

Sep 18, 2023

भारतीय लोकतंत्र तमाम खूबियों के बावजूद अब तक संसदीय परम्पराओं की उन ऊंचाइयों को नहीं छू पाया है जिसकी उम्मीद शायद सभी देशवासियों को है। पुराने संसद भवन में कार्यवाही के आखिरी दिन चले आरोप-प्रत्यारोप के दौर से अगर राजनीतिक दल उबर पाते तो शायद हमारा लोकतंत्र परिपक्व परिवेश में नजर आ सकता था। यह स्वीकार करने में कतई संकोच नहीं कि आज हमारी राजनीति चुनावी हार-जीत के चक्रव्यूह में ऐसी उलझ चुकी है कि उसके बाहर आने की कल्पना भी बेमानी लगती है।

उम्मीद थी कि संसद का विशेष सत्र आपसी कड़वाहट को भुलाकर समन्वय के दौर का संदेश देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, जो आने वाले दौर की टकराहट की तरफ इशारा करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। आज से संसद नए भवन में स्थानांतरित हो रही है। पुराने संसद भवन में शुरू हुए विशेष सत्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और अटलबिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व और कृतित्व का उल्लेख किया। लेकिन बारी जब विपक्ष की आई तो वही तल्खी नजर आई जो सामान्य सत्रों में रहा करती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पीएम मोदी की तरफ मुखातिब होते हुए यहां तक कह दिया कि थोड़ा दिल बड़ा करके देखो और कुछ नहीं कर सकते तो कुर्सी छोड़ दो। क्या इससे बचा नहीं जा सकता था? संसद भवन की जिस इमारत से लोकतंत्र ७५ साल तक चला उसी इमारत में आखिरी दिन प्रेम और सौहार्द से गुजारा जाता तो अच्छा नहीं होता? हमारे सांसदों को समझना चाहिए कि संसद में वे जो कुछ बोलते हैं, उसकी गूंज देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी सुनाई पड़ती है। मोदी ने जब नेहरू, शास्त्री और इन्दिरा गांधी की उपलब्धियों का जिक्र किया तब भी कांग्रेसी सांसदों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी। मोदी ने कम्युनिस्ट पार्टी के इन्द्रजीत गुप्त का उल्लेख भी किया तो समाजवादी पार्टी के 93 वर्षीय सांसद शफीकुर्रहमान बर्क की प्रशंसा भी की।

संसदीय परम्पराओं के मायने सिर्फ विरोधी दल पर प्रहार करना ही नहीं होना चाहिए बल्कि उनकी जायज प्रशंसा भी होनी चाहिए। आज से संसद जब अपने नए भवन में काम शुरू करेगी तो उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारे राजनेता नए भवन में नई परम्पराएं स्थापित करेंगे। सांसदों ने हंगामा व शोर-शराबा छोड़ कर संसद की कार्यवाही में भाग लिया तो हमारा लोकतंत्र और परिपक्व होकर नई ऊंचाइयां छूने की ओर अग्रसर हो सकेगा।