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बदलते श्रम बाजार में पहचान और अधिकारों का संकट

कामगार अपनी गाड़ी, ईंधन, मोबाइल, बीमा और बाकी खर्च खुद उठाते हैं। दुर्घटना जैसी स्थिति में भी उन्हें नियोक्ता की ओर से कोई सुरक्षा नहीं मिलती। यह उद्यमिता नहीं, बल्कि बड़े द्वारा छोटे पर जोखिम थोपने की अनुचित व्यवस्था है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Jan 08, 2026

-अजीत रानाडे, वरिष्ठ अर्थशास्त्री (द बिलियन प्रेस)

कुछ वर्ष पहले मुंबई के बांद्रा स्थित परिवहन आयुक्त कार्यालय के बाहर ओला और उबेर के हजारों ड्राइवरों ने प्रदर्शन किया था। उनकी मांगें साधारण थीं- बेहतर किराया, उचित कमीशन, मानवीय कार्य घंटे और मनमाने दंड से सुरक्षा, लेकिन प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए। कारण बताया गया कि ये ड्राइवर कर्मचारी नहीं, बल्कि बिजनेस पार्टनर हैं यानी अपनी-अपनी छोटी इकाइयां चलाने वाले उद्यमी। यह घटना केवल टैक्सी चालकों के लिए ही नहीं, बल्कि उन लाखों कामगारों के लिए भी आंख खोलने वाली थी, जो काम से जुड़े सारे जोखिम तो उठाते हैं, पर सुरक्षा व अधिकारों से लगभग वंचित हैं। आज जिसे गिग इकोनॉमी कहा जाता है, वह कोई नई व्यवस्था नहीं है। यह भारत की पुरानी श्रम संरचना ही है, जिसने अब डिजिटल मुखौटा ओढ़ लिया है।

करीब दो दशक पहले अर्जुन सेनगुप्ता समिति ने बताया था कि असंगठित क्षेत्र के करीब 64 प्रतिशत कामगार स्वरोजगार में हैं। उनका कोई तय नियोक्ता नहीं है। ये कामगार थोड़े-थोड़े समय के लिए कई मालिकों के साथ काम करते थे- निर्माण श्रमिक, घर से काम करने वाले कारीगर, फेरीवाले और टुकड़ा-दर-टुकड़ा मजदूरी करने वाले। आज के गिग वर्कर उसी परंपरा के तकनीकी उत्तराधिकारी हैं तो सवाल उठता है कि गिग कामगार अब इतने संगठित होकर सड़कों पर क्यों उतर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि प्लेटफॉर्म आधारित काम का दायरा और दबाव अब बहुत बढ़ चुका है और इसने निर्भरता की प्रकृति को ही बदल दिया है। मुंबई में हालिया आंदोलन के दौरान करीब 90 प्रतिशत ऐप आधारित टैक्सियां सड़कों से हट गईं। ड्राइवरों ने काली-पीली टैक्सियों के बराबर किराया, कमीशन की सीमा, वेलफेयर बोर्ड और राज्य स्तर पर गिग वर्कर कानून की मांग की। यही असंतोष फूड डिलीवरी कर्मियों, वेयरहाउस कर्मचारियों और इंस्टेंट मार्केटिंग से जुड़े राइडर्स में भी दिखाई देता है। देशव्यापी आंदोलनों में न्यूनतम मासिक आय, नियत कार्य घंटे और सामाजिक सुरक्षा की मांग प्रमुख रही है। असल समस्या बुनियादी असमानता की है।

दूसरी ओर, कामगार अपनी गाड़ी, ईंधन, मोबाइल, बीमा और बाकी खर्च खुद उठाते हैं। दुर्घटना जैसी स्थिति में भी उन्हें नियोक्ता की ओर से कोई सुरक्षा नहीं मिलती। यह उद्यमिता नहीं, बल्कि बड़े द्वारा छोटे पर जोखिम थोपने की अनुचित व्यवस्था है। कंपनियों की जानी-पहचानी दलील है कि अस्थिर रोजगार भी बेरोजगारी से बेहतर है और ज्यादा नियम नवाचार को नुकसान पहुंचाएंगे। यह बात आंशिक रूप से सही हो सकती है। भारत को रोजगार चाहिए और प्लेटफॉर्म ने मौके बढ़ाए भी हैं, पर यह तर्क लचीलेपन और असुरक्षा को गड्डमड्ड कर देता है। कामगारों से बुनियादी सुरक्षा छीनकर रोजगार पैदा करने वाला श्रम बाजार विकास का टिकाऊ मॉडल नहीं हो सकता। परंपरागत श्रमिक आंदोलन कारखानों और स्पष्ट नियोक्ताओं के इर्द-गिर्द संगठित होते थे। गिग कामगारों के पास न तो कारखाना है और न ही पहचाना हुआ नियोक्ता। वे सचमुच नियोक्ताविहीन हैं। यही कारण है कि उनका संगठित होना जरूरी भी है और स्वाभाविक भी।

भारत में चार श्रम संहिताओं, खासकर सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020, के जरिये पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को अलग श्रेणी के रूप में मान्यता दी गई है। उन्हें राज्य की ओर से तैयार सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए पात्र माना गया है। प्रस्ताव है कि तय अवधि तक काम करने पर उन्हें बीमा और स्वास्थ्य कवर जैसे लाभ मिल सकें। ई श्रम पंजीकरण, वेलफेयर बोर्ड और प्लेटफॉर्म पर उपकर जैसे उपाय एक चलायमान सुरक्षा जाल बना सकते हैं। राजस्थान और तेलंगाना ने इस दिशा में आगे बढ़कर कानून भी बनाए हैं। फिर भी यह मानना होगा कि ये संहिताएं न्यूनतम वेतन, कार्य घंटे, सामूहिक सौदेबाजी और मनमाने डिएक्टिवेशन से सुरक्षा जैसे मूल अधिकारों तक नहीं पहुंचती। सामाजिक सुरक्षा अब भी योजनाओं पर आधारित और काफी हद तक विवेकाधीन है। जिन कामगारों की आय रोज बदलती है और जिनका काम एक क्लिक में बंद हो सकता है, उनके लिए यह सुरक्षा अभी कमजोर है।

इन आंदोलनों का महत्व भारत के श्रम बाजार में हो रहे गहरे बदलाव से जुड़ा है। यदि भविष्य का कामकाज बड़े पैमाने पर प्लेटफॉर्म आधारित होगा, तो औपचारिकता का मतलब केवल स्थायी नौकरी नहीं हो सकता। इसका अर्थ होना चाहिए सभी कामगारों के लिए न्यूनतम अधिकार- उचित पारिश्रमिक, सुरक्षा, बीमा और न्यायपूर्ण प्रक्रिया। भले ही इन कामगारों को कर्मचारी, बिजनेस पार्टनर या स्व-नियोजित ठेकेदार कहा जाए। इस नजरिये से गिग कामगारों का आंदोलन विकास विरोधी नहीं, बल्कि व्यवस्था को मजबूत करने की मांग है। नीति निर्माताओं के लिए चुनौती गिग इकोनॉमी को खत्म करने की नहीं, बल्कि इसे 'सभ्य' बनाने की है। यदि भारत यह संतुलन साध लेता है, तो गिग इकोनॉमी एक समावेशी श्रम बाजार की ओर जाने वाला सेतु बन सकती है, न कि स्थायी असुरक्षा की बंद गली। यही वास्तविक नवाचार होगा।