
Karpoor Chandra Kulish Birth Centenary
Karpoor Chandra Kulish Birth Centenary: भारतीय पत्रकारिता के भाल पर अपने उसूलों और बेबाकी का अमिट तिलक लगाने वाले राजस्थान पत्रिका के संस्थापक संपादक, श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी की यह जन्म शताब्दी (1926-2026) है। आज जब हम उनके 100वें जन्म वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं, तो उनका स्मरण केवल एक सफल अख़बार निकालने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे 'योद्धा पत्रकार' के रूप में किया जाना चाहिए जिसने सत्ता के अहंकार के आगे कभी घुटने नहीं टेके। कुलिश जी के लिए पत्रकारिता कोई व्यावसायिक उद्यम नहीं था, बल्कि यह समाज को आईना दिखाने और अन्याय के खिलाफ मुखर होने का एक पवित्र मिशन था। उनकी लेखनी में वह धार थी, जो सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसार देती थी। वे इस बात के ज्वलंत उदाहरण थे कि अगर एक संपादक अपने जमीर और सत्य पर अडिग रहे, तो बड़ी से बड़ी सरकार को भी अंततः सत्य के आगे झुकना ही पड़ता है।
कुलिश जी की बेबाकी का सबसे प्रखर और ऐतिहासिक उदाहरण राजस्थान के तत्कालीन कद्दावर कांग्रेसी नेता और गृह मंत्री रामकिशोर व्यास से जुड़ा है। व्यास जी उस दौर में राजस्थान की राजनीति का एक बहुत बड़ा और प्रभावशाली नाम थे। जब कुलिश जी के संज्ञान में यह बात आई कि स्वयं गृह मंत्री अपने ही घर में अपनी बहू को प्रताड़ित कर रहे हैं, तो एक आम संपादक शायद इस खबर को 'घरेलू मामला' या 'रसूखदार नेता का निजी जीवन' मानकर नजरअंदाज कर देता, लेकिन कुलिश जी की मिट्टी किसी और ही धातु की बनी थी। उनका साफ तौर पर मानना था कि जो व्यक्ति अपने ही घर में न्याय नहीं कर सकता, वह पूरे राज्य की कानून-व्यवस्था (गृह मंत्रालय) कैसे संभाल सकता है? कुलिश जी ने बिना किसी डर या दबाव के, बेबाक कलम उठाई और राजस्थान पत्रिका के पन्नों पर गृह मंत्री के इस कृत्य के खिलाफ खुल कर लिखा। उन्होंने उस अन्याय को सरेआम उजागर कर दिया।
एक कैबिनेट मंत्री और वो भी गृह मंत्री के खिलाफ सीधे मोर्चा खोलने का असर वही हुआ, जिसकी उम्मीद थी—राज्य सरकार में भूचाल आ गया। सत्ता के गलियारों में खलबली मच गई। अपनी साख को बचाने और अख़बार को सबक सिखाने के लिए सरकार ने अपना सबसे पुराना और आजमाया हुआ हथियार निकाला: पत्रिका के विज्ञापनों पर रोक लगा दी। राजस्थान पत्रिका के सरकारी विज्ञापन पूरी तरह से बंद कर दिए गए। एक अख़बार के लिए विज्ञापन उसकी आर्थिक रीढ़ होते हैं। सत्ता को लगा था कि आर्थिक तंगी से घबरा कर कुलिश जी समझौता कर लेंगे या माफ़ी मांग लेंगे। लेकिन पत्रिका न झुका, न रुका। कुलिश जी ने नुकसान उठाना मंजूर किया, रातों की नींदें हराम कीं, आर्थिक संकट झेला, लेकिन सत्य की राह नहीं छोड़ी। उनका संकल्प था कि अख़बार की कीमत रुपयों में नहीं, बल्कि पाठकों के भरोसे से तय होती है।
करीब एक साल तक यह आर्थिक नाकेबंदी और संघर्ष चलता रहा। अंततः, जब चुनाव का समय नजदीक आया और जनता के बीच सरकार की छवि धूमिल होने लगी, तब गृह मंत्री रामकिशोर व्यास को सत्य का एहसास हुआ। वे पटरी पर आए, उन्होंने कुलिश जी के सामने अपनी गलती मानी और इस तरह सत्य के एक निडर सिपाही के सामने सत्ता के अहंकार की हार हुई।
कुलिश जी ने राजस्थान पत्रिका की नींव में जो निर्भीकता और उसूलों का डामर बिछाया था, उसी का परिणाम है कि उनके बाद भी इस संस्थान ने कभी सत्ता के दबाव में 'समझौता' करना नहीं सीखा। इस अखबार में विज्ञापनों पर रोक लगा कर अख़बार की आवाज दबाने का प्रयास इतिहास में कई बार हुआ, मसलन आपातकाल के काले दिनों में भी जब प्रेस पर सेंसरशिप थी, पत्रिका ने अपने तेवर नहीं छोड़े, जिसके कारण कई तरह की सरकारी बंदिशें झेलनी पड़ीं। राजनीतिक मतभेदों और जनहित के मुद्दों पर स्पष्ट राय रखने के कारण पूर्व मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के दौर में भी कई बार ऐसे प्रसंग आए जब अख़बार और सरकार के बीच तल्खी बढ़ी।
कुलिश जी का रोपा गया बेबाकी का वह बीज वर्षों बाद एक वटवृक्ष बन चुका था, जिसका सबसे बड़ा प्रमाण वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री कार्यकाल (2017-18) के दौरान देखने को मिला। वसुंधरा सरकार एक ऐसा विवादास्पद अध्यादेश (CrPC संशोधन) लेकर आई थी, जिसके तहत भ्रष्ट लोक सेवकों, जजों और बाबुओं के खिलाफ बिना सरकार की पूर्व अनुमति के न तो जांच हो सकती थी और न ही मीडिया उनके नाम उजागर कर सकता था। यह सीधे तौर पर प्रेस की आज़ादी पर हमला था। राजस्थान पत्रिका ने अपनी परंपरा का निर्वहन करते हुए इस 'काले कानून' का पुरजोर विरोध किया। बदले की कार्रवाई करते हुए वसुंधरा सरकार ने भी वही पुराना हथकंडा अपनाया—पत्रिका के विज्ञापनों पर रोक लगा दी, लेकिन कुलिश जी के आदर्शों पर चलने वाले इस अख़बार ने घुटने टेकने के बजाय इतिहास का सबसे साहसिक अभियान छेड़ दिया: 'जब तक काला, तब तक ताला'। पत्रिका ने ऐलान कर दिया कि जब तक यह काला कानून वापस नहीं लिया जाता, तब तक अख़बार मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से जुड़ी किसी भी खबर को प्रकाशित नहीं करेगा (उनके समाचारों पर ताला लगा रहेगा)। महीनों तक विज्ञापनों का भारी आर्थिक नुकसान सहने के बावजूद पत्रिका अपने फैसले पर अडिग रहा। आखिरकार भारी जनदबाव और पत्रिका की इस बेमिसाल मुहिम के आगे वसुंधरा सरकार को झुकना पड़ा और वह बिल विधानसभा की प्रवर समिति को सौंपकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
आज कर्पूर चन्द्र कुलिश जी की जन्म शताब्दी पर उनका स्मरण करते हुए यह साफ जाहिर हो जाता है कि उन्होंने केवल एक समाचार पत्र की स्थापना नहीं की थी, बल्कि एक 'संस्थागत चरित्र' का निर्माण किया था। रामकिशोर व्यास के प्रकरण से लेकर वसुंधरा राजे के काले कानून तक, जो एक धागा समान रूप से जुड़ा है, वह है—निडरता और जनहित के प्रति अडिग समर्पण। ऐसे में कुलिश जी का जीवन इस बात का घोषणापत्र है कि जब कलम सत्य की स्याही से चलती है, तो बड़े से बड़ा सत्ताधीश भी बौना नजर आता है। उन्होंने सिखाया कि अख़बार की असली ताकत सरकारी विज्ञापनों में नहीं, बल्कि जनमानस की आवाज बनने में है। आज के दौर में, जब मीडिया पर अक्सर सत्ता के सामने नतमस्तक होने के आरोप लगते हैं, कुलिश जी की यह 'बेबाकी' भारतीय पत्रकारिता के लिए एक लाइटहाउस यानि प्रकाश-स्तंभ की तरह है, जो हमें याद दिलाती है कि पत्रकार का पहला और आखिरी धर्म केवल सत्य के प्रति जवाबदेह होना है।
Published on:
14 Mar 2026 10:58 pm
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