
-जसबीर सिंह, पूर्व अध्यक्ष राजस्थान अल्प संख्यक आयोग
गुरु गोबिन्द सिंह जी की जीवनधारा व कर्मक्षेत्र को समझने के लिए हमें हमारे देश की उस समय की परिस्थितियों व वातावरण को समझना बेहद आवश्यक है। गुरु गोबिन्द सिंह जी के जन्म से काफी पहले ही दसवीं शताब्दी से लेकर 1526 तक भारत पर लगभग साठ बड़े आक्रमण हो चुके थे जिनमें तीन आक्रमण सुबुक्तगीन, सत्रह मुहम्मद गोरी, पच्चीस मंगोलों के और पांच मुगलों के थे। सिक्ख परम्परा के प्रथम गुरु गुरुनानक देव जी के समय तक भयानक कत्लेआम, अत्याचार और धर्मान्तरण जोरों पर था। सिख परम्परा के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी व छठे गुरु हरगोबिन्द जी पर भी हुकुमत के अत्याचार व पीड़ा देने के कृत्य जारी रहे। औरंगजेब के शासनकाल में तो इस जुल्मों सितम की पराकाष्ठा होने लगी। पूरे देश को राज्य नीति के अन्तर्गत इस्लामी राज्य बना दिया गया। झरोखा दर्शन को व्यक्ति पूजा मानकर प्रतिबन्धित कर दिया गया। नवरोज, संगीत और नृत्य पर पाबन्दियां लगा दी गई। बहुसंख्यक समाज के साथ राजकीय सेवाओं में भेदभाव किया जाने लगा। बहुसंख्यक समाज द्वारा हाथी, घोड़ा पालकी की सवारी व हथियार रखने पर रोक लगा दी गयी। 1661 में मंसूर ए सानी सूफी मोहम्मद सरमद का सूफी सिद्धान्तों में विश्वास रखने के कारण कत्ल कर दिया गया। कुल मिलाकर देश में बहुत ही डरावना व दमघोटू वातावरण निर्मित हो गया।
गुरु गोबिन्द सिंह जी के पिता हिंद की चादर गुरु तेग बहादुर जी तिलक और जनेऊ की रक्षा के लिए धर्मान्तरण का विरोध करने पर शहीद हो चुके थे। गुरु गोबिन्द सिंह जी उस समय मात्र 9 वर्ष के थे। आनन्दपुर में रह रहे गुरु गोबिन्द सिंह जी ने पिता के बलिदान का समाचार वर्ष 1675 में जब सुना तो उन्होंने अनुभव किया कि सिक्ख धर्म को मानने वालों ने बेशक शहादत देकर मानवता के कोमल गुणों यथा विनम्रता, प्रेम, अहिंसा के पालन का एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है परन्तु अब समय आ गया है जब एक कुशल कारीगर की समय पर लगाई गई हथौड़े की चोट की भांति समाज को मानवता के इन्हीं गुणों की सुरक्षा करने के लिए एक नए मोड़ की तीव्र आवश्यकता है। शस्त्र रखना, घुड़सवारी करना और नियमबद्ध धार्मिक दिनचर्या तो पहले से ही सिक्ख जीवन का अंग बन चुके थे, अब इन्हें सुव्यवस्थित करने के लिए और इसमें नए प्राण फूंकने के लिए आदि ग्रन्थ साहिब की वाणियों के साथ-साथ गुरु गोबिन्द सिंह जी ने वीर रस के साहित्य का अनुशीलन, सृजन व अनुवाद प्रारम्भ कर दिया।
साहित्य के महान सृजक के रूप में उनकी सम्पूर्ण उपलब्ध कृतियां ‘दशमग्रन्थ’ के नाम से संग्रहित हैं। इनमें जहां एक ओर गुरु गोबिन्द सिंह जी ने तोमर, नाराच, छप्पय, भुजंग प्रयात आदि वीर छन्दों का प्रयोग किया है, वहीं साथ ही साथ संस्कृत, ब्रजभाषा, फारसी और पंजाबी गुरुमुखी भाषा पर अपनी पकड़ का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया तथा अपने शिष्यों को सब भाषाएं जानने के लिए प्रेरित किया। उनकी अधिकांश वाणी व साहित्य वीर रस में है, जिसे पढऩे या सुनने पर वीरता, तेजस्व व ओजस्व का भाव जागृत होता है। उन्होंने जफरनामा, जापुसाहिब, अकाल उसतत, बचित्र नाटक, चंडी चरित्र, अथचउबीस अवतार, शस्त्रनाम माला, गोबिन्द गीता, अकाल पुरख वाच, रक्तबीजयुक्त कथन, सूर्य चन्द्र अवतार कथन आदि बेशुमार साहित्य लिखा तथा भारतीय दर्शन, चिन्तन, धर्म और अध्यात्म का पुर्नलेखन तथा पुर्नव्याख्या अद्वितीय, अनूठे व अद्भुत तरीके से की। गुरु गोबिन्द सिंह जी एक दूरदर्शी, कल्पनाशील और चुम्बकीय व्यक्तित्व वाले महान संगठनकर्ता भी थे। समस्याओं पर उनकी पकड़ सुदृढ़ थी और भारतीय समाज की समस्याओं के निदान और अत्याचारियों के दमन को समाप्त करने के लिए उनके पास सुस्पष्ट कार्यक्रम था। उन्होंने लोगों को स्पष्ट कर दिया कि उन्हें धर्म स्थापना के कार्य के लिए, दुष्टों के दमन के लिए और संतों के सत्वगुण की रक्षा करने के लिए ही ईश्वरीय प्रेरणा प्राप्त हुई है।
अपनी पूर्व जन्म की आत्मकथा ‘बिचित्र नाटक’ में इस जन्म में ईश्वर द्वारा दी गई भूमिका का स्पष्ट उल्लेख करते हुए वह लिखते हैं: ‘यही काज धरा हम जनमं, समझ लेहु साधु सभ मनमं, धरम चलावन सन्त उबारन, दुसट सभन को भूल उपारन।’ गुरू गोबिन्द सिंह जी ने 1699 की ‘बैसाखी’ के दिन एक बर्तन (बाटे) में लाहौर निवासी दयाराम ‘खत्री’, हस्तिनापुर निवासी धर्मदास ‘जाट’, द्वारिका निवासी मुहकमचन्द ‘छीपा’, बीदर ‘कर्नाटक’ निवासी साहबचन्द ‘नाई’ और जगन्नाथपुरी निवासी हिम्मत राय ‘कहार’ को अमृतपान कराकर जातिवाद के खंडहर को ध्वस्त कर इनको क्रमश: दयासिंह, धर्मसिंह, मोहकम सिंह, साहिब सिंह और हिम्मत सिंह बनाकर इन्हें पंज प्यारे संज्ञा से आभूषित कर दिया और खालसा पंथ की स्थापना कर डाली।
अब खालसा की लड़ाई और विजय व्यक्तिगत न होकर सामूहिक हो गई और इस सामूहिकता को भी प्रभु ‘वाहेगुरू’ की जीत माना जाने लगा। खालसा वाहेगुरु अर्थात् ‘परमात्मा’ के कार्य को आगे बढ़ाने वाला और चक्रचिह्नों के भेदभाव से दूर ईश्वर की फतह के लिए कार्य करने लगा। बोले सो निहाल सतश्री अकाल जयघोष बन गया। गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा 1699 की बैसाखी के पहले ही दिन बीस हजार चिडिय़ा बाज बन गईं और हजारों गीदड़ बने शेरों ने फिर गर्जन प्रारम्भ कर दी। इसीलिए गुरु गोबिन्द सिंह जी ने कहा भी
चिडिय़ा ते मैं बाज तुड़ाऊं, गिदड़ों से मैं शेर बनाऊं
सवा लाख से एक लड़ाऊं, तभै गोबिन्द सिंह नाम कहाऊं।
उन्होंने संगठन शक्ति को अपराजेय करने के लिए ऊंच नीच और छुआछूत के भेद को समाप्त किया तथा स्वाभिमान युक्त विजयशील होने वाली संगठित कार्यशक्ति को खड़ा कर डाला। इस के लिए उन्होंने क्रांतिकारी घोषणा कर डाली
‘‘जिनकी जात और कुल मांही, सरदारी नंहि भई कदांही
उनंही को सरदार बणावों, तबै गोबिन्द सिंह नाम सदावों।
उस काल में उन्होंने तथाकथित निम्न जातियों के लोगों को ऐसी अभूतपूर्व गुणगरिमा देकर व नेतृत्वकर्ता बनाकर देश के इतिहास में अनोखा कार्य कर डाला। गुरुजी ने समाज के पतितों और दलितों को ऊपर उठाया, अनाथों को सहारा दिया व उनमें अपार प्राणशक्ति, आत्मविश्वास व आत्मसम्मान संचारित किया। अत्याचार और अनाचार को भाग्य का दोष कहकर स्वीकार करने वाले लोगों में से उन्होंने महान् शूरवीर पैदा कर दिए। मृत्यु के भय को उन्होंने मानो मंत्र के बल से उड़ा दिया। सिर हथेली पर रखकर उनके सिंहों ने जबरन धर्मान्तरण व अन्याय को ललकारा व देश में नई इतिहास गाथा रच डाली किंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनका युद्ध किसी धर्म के विरुद्ध न होकर फिरकापरस्ती, अत्याचार, कट्टरता व जबरन धर्मान्तरण के विरुद्ध था। वह सम्पूर्ण मानवता में प्रभु के दर्शन करते थे इसलिए उन्होंने फरमाया भी ‘हिंदू तुरक कोऊ राफजी इमाम साफी, मानस की जात सभै एको पहिचानबो’। जहां एक उच्च सन्त के रूप में वह अपने शिष्यों को कहते हैं ‘साच कहूं सुन लेहो सभै, जिन प्रेम कियो तिन ही प्रभ पायो’ वहीं एक अदम्य साहस से परिपूर्ण यौद्धा के रूप में अपने सर्वंश, अपने पिता, चारों साहिबजादों व माता गुजरी की शहादत के बाद भी तत्कालीन शासक औरंगजेब को फारसी में लिखे चुनौती भरे पत्र जफरनामा में लिखते हैं ‘चूं कर अज हमहे हिलते दर गुजश्त, हलाल अस्त बुरदन बा शमशीर दस्त’’ अर्थात् जब संवाद के तमाम रास्ते बन्द हो जाएं तो शमशीर को हाथ में ले लेना या तलवार को उठा लेना जायज होता है।’
गुरुजी को बाल्यकाल में शस्त्र विद्या का शानदार प्रशिक्षण देने का सौभाग्य क्षत्रिय वज्र सिंह राठौड़ को प्राप्त हुआ। हम सभी को यह सदैव याद रखना चाहिए कि गुरुनानक से लेकर गुरु गोबिन्द सिंह जी तक सभी सिख गुरुओं ने विभिन्न जातियों, पंथों, क्षेत्रों के भारत को सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और धार्मिक स्तर पर एक सूत्र में पिरोने का अद्भुत कार्य किया था। गुरु गोबिन्द सिंह जी ने जिन पांच प्यारों को अमृत छकाकर खालसा पंथ का सृजन किया वो देश की विभिन्न जातियों, क्षेत्रों व दिशाओं यथा लाहौर, बीदर, द्वारका, जगन्नाथपुरी व हस्तिनापुर (वर्तमान दिल्ली) के रहने वाले थे। सिखों के श्री गुरुग्रन्थ साहिब में सिख गुरुओं के साथ-साथ देश के उस समय तक के तीस उच्च संतों यथा कबीर जी, नामदेव जी, रविदास जी, धन्नाजी, पीपा जी, त्रिलोचन जी, फरीद जी, दादू जी आदि की वाणी शामिल है, जो प्रत्येक गुरुद्वारे में पूरे अदब से शबद कीर्तन के रूप में गाई जाती है। गुरु गोबिन्द सिंह जी का प्रकाश (जन्म) पटना साहिब (बिहार) में हुआ, उन्होंने खालसा पंथ का सृजन आनन्दपुर साहिब (पंजाब) में किया, गुरु ग्रन्थ साहिब का सम्पादन दमदमा साहिब पंजाब में किया, 52 महान कवियों का दरबार पाऊंटा साहिब हरियाणा में सजाते थे तथा वह परम्ज्योति में विलीन 1708 में नांदेड़ (महाराष्ट्र) में हुए। सिख गुरुओं ने अपने प्राणों सहित अपना सब कुछ इस महान् राष्ट्र व इसकी एकता, अखण्डता तथा धर्म के लिए बलिदान कर दिया। गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा सृजित सिक्ख राष्ट्र व धर्म की रक्षा के लिए सदैव आगे रहे हैं। उनका योगदान देश की आजादी की लड़ाई से लेकर वर्तमान राष्ट्र निर्माण के कार्यों में भी वन्दनीय है।
Published on:
26 Dec 2025 06:03 pm
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