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महिला सुरक्षा का सवालः कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा और भागीदारी

निर्भया मामले के बाद यौन हिंसा कानूनों को कड़ा किया गया है पर ऐसे अपराध रुके नहीं है। समग्रता में देखें तो भारत अपनी आधी मानव पूंजी की अपार विकास संभावनाओं को नजरअंदाज कर रहा है। अगर महिलाओं को यौन हिंसा संबंधी खतरों या उनकी चिंताओं से लगातार जूझना पड़ता है तो कार्यबल में उनकी भागीदारी बढ़ाना हमेशा निराशाजनक पहलू रहेगा।

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जयपुर

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Nitin Kumar

Aug 23, 2024

अजीत रानाडे
लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं
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मुम्बई के ख्यातनाम किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल में 1973 में एक सफाईकर्मी ने महिला नर्स अरुणा शानबाग का यौन उत्पीडऩ किया। उसने कुत्ते को बांधने वाली जंजीर से महिला नर्स का गला घोंटा, उसके साथ बलात्कार किया और उसे मरा हुआ समझकर फरार हो गया। प्रताडऩा से अरुणा का पूरा शरीर पैरलाइज हो गया। अगले 41 वर्षों तक वह जिंदा लाश बनकर रहीं। नर्सों ने अस्पताल में ही उनकी देखभाल की। कोलकाता में ट्रेनी डॉक्टर के साथ हैवानियत की घटना गवाह है कि इस घटना के 51 साल बाद भी कुछ नहीं बदला है। कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा का मुद्दा एक बार फिर जोर-शोर से फोकस में है।

ऐसी घटनाएं कार्यबल में महिला भागीदारी पर असर डालने वाले मुख्य कारकों में एक है। जी-20 के सभी देशों में कार्यबल में महिलाओं की सबसे कम भागीदारी दर वाले देशों में भारत एक है। इसमें गिरावट ही आई है। 2004 में यह 30त्न था जो 2017 तक 20त्न रह गया। कोविड के बाद के वर्षों में इसमें सुधार हुआ है। आपूर्ति और मांग से जुड़े विभिन्न कारक इस गिरावट के लिए जिम्मेदार हैं। एक कारक है मांग पक्ष में नियोक्ताओं द्वारा महिलाओं को हायर करने की अनिच्छा-चाहे वह ब्लू कॉलर विनिर्माण क्षेत्र हो या वाइट कॉलर सेवा क्षेत्र। मांग पक्ष में एक और कारक है विमिन-फ्रेंडली कानून। मातृत्व अवकाश के राष्ट्रीय कानून के कारण महिलाओं की नियुक्तियां कम ही हुई हैं, न कि बढ़ी हैं। कार्यस्थल पर सुरक्षा से जुड़े कारक की बात करें तो नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो के अनुसार पिछले चार सालों में लैंगिक अपराध 20त्न बढ़े हैं। यह आकलन कम ही है क्योंकि ज्यादातर अपराध दर्ज ही नहीं हो पाते। वजह-प्रतिशोध, पीडि़ता की पहचान उजागर होने का भय और पुलिस जांच में भरोसा न होना। 2001 में कोलकाता के इसी अस्पताल में हुई हैवानियत के मामले की जांच से साबित होता है कि किस तरह लापरवाही बरती गई और अपराधी को सजा नहीं दी जा सकी। इसके अलावा पीडि़ता को ही दोषी ठहराने की मनोवृत्ति व महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह या द्वेषपूर्ण रवैया आदि कारक भी हैं जिसके चलते वे शिकायत दर्ज नहीं करातीं। ‘कार्यबल में महिला भागीदारी दर पर हिंसा के भय का असर’ को लेकर तनिका चक्रवर्ती व नफीसा लोहावाला के 2021 के शोधपत्र में उल्लेखित है-‘एक जिले में प्रति 1,000 महिलाओं पर एक अतिरिक्त अपराध मोटे तौर पर 32 महिलाओं के कार्यबल में शामिल होने की संभावना को कम कर देता है।’

निर्भया मामले के बाद यौन हिंसा कानूनों को कड़ा किया गया है पर ऐसे अपराध रुके नहीं है। भारत की अर्थव्यवस्था पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ता है। समग्रता में देखें तो भारत अपनी आधी मानव पूंजी की अपार विकास संभावनाओं को नजरअंदाज कर रहा है। अगर महिलाओं को यौन हिंसा संबंधी खतरों या उनकी चिंताओं से लगातार जूझना पड़ता है तो कार्यबल में उनकी भागीदारी बढ़ाना हमेशा निराशाजनक पहलू रहेगा।
(द बिलियन प्रेस)