
Swami gyan swaroop sanand
मौलिक सिसोदिया, सामाजिक कार्यकर्ता
पिछले दिनों गंगा संरक्षण को लेकर विशेष कानून की मांग कर रहे वैज्ञानिक संत डॉ. गुरु दास अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद ने अनशन करते हुए दम तोड़ा तो आम भाारतीय की अंतररात्मा कराह उठी। स्वामी ज्ञानस्वरूप सदानंद अपने लिए नहीं बल्कि गंगा और उसकी सहायक नदियों को संरक्षित करने के लिए विशेष कानून बनाने की मांग कर रहे थे। वही गंगा, जो चालीस करोड़ लोगों के लिए जीवनदायिनी है।
यह वक्त डॉ. अग्रवाल की मांगों को दोहराने का नहीं बल्कि इस बात पर चिंता करने का है कि किस तरह से लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार और यहां तक कि समाज के जागरूक तबके ने उनकी किस तरह से उपेक्षा की। वे चार महीने से अनशन कर रहे थे। उनकी मांगों को लेकर सबको खबर थी लेकिन शासन-प्रशासन ने परवाह करने की जरूरत ही नहीं समझी।
शायद ऐसा इसलिए क्योंकि वे अपनी मांगों को लेकर उन सिद्धांतों के साथ आंदोलन कर रहे थे जो उन्होंने महात्मा गांधी से सीखे थे। शायद इसलिए भी गंभीरता से नहीं लिया होगा क्योंकि स्वामी जी के पीछे कोई वोट बैंक भी नहीं था।
गंगा की खातिर डॉ. अग्रवाल के इस बलिदान को सामान्य तौर से नहीं लिया जा सकता। दरअसल यह सरकार की तरफ से सोची-समझी नीति हो सकती है। लेकिन कोई यह सोचे कि डॉ. अग्रवाल की आवाज शांत होने से भविष्य में कोई कार्यकर्ता की आवाज बुलंद नहीं हो सकेगी, तो वह गलतफहमी में है।
दरअसल शासन में बैठे लोग इतने संवेदनहीन हो गए कि डॉ. अग्रवाल जैसे कार्यकर्ताओं की मौत से भी उनके चेहरे पर पल भर भी शिकन नहीं आती। समाज का बड़ा दोष तो मौन रहने का ही है। इसी मौन की वजह से रोजाना सत्य की आवाजें मर रहीं हैं। किसी भी सरकार में अधिनायकवाद का चेहरा शायद ऐसा ही होता है। स्वतंत्र सोच पर अपने विचारों का एकाधिकार जमाने की प्रवृत्ति और नवराष्ट्रवाद यही है। हमें समाज के हिस्से के रूप में अधिक सावधान रहने और बुलंद आवाज उठाने की जरूरत है।
हमें सरकारों के प्रति बेहद विनम्र और आज्ञाकारी होने का भाव छोडऩा होगा। क्योंकि सरकार की नजर में केवल चुनाव ही होते हैं। हम भी वही देख रहे हैं जो सरकार दिखाना चाहती है। हमें याद रखना होगा कि डॉ. अग्रवाल की लड़ाई स्वहित से हटकर समाज के लिए थी।
(पर्यावरण व जल संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय। 'लीड इंडिया' संस्था के फेलो।)
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