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…तो वह पाक फौजियों को कच्चा चबा जाएगी

पत्रिका समूह के संस्थापक कर्पूर चंद्र कुलिश जी के जन्मशती वर्ष के मौके पर उनके रचना संसार से जुड़ी साप्ताहिक कड़ियों की शुरुआत की गई है। इनमें उनके अग्रलेख, यात्रा वृत्तांत, वेद विज्ञान से जुड़ी जानकारी और काव्य रचनाओं के चुने हुए अंश हर सप्ताह पाठकों तक पहुंचाए जा रहे हैं।

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कश्मीर में पहलगाम में आतंकी हमले के बाद से ही समूचे देश की निगाह भारत की प्रतिक्रिया पर थी। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के रूप में पाकिस्तानी आतंकी ठिकानों पर की गई भारतीय सेना की एयर स्ट्राइक ने सेना के शौर्य व पराक्रम की अमिट गाथा लिख दी है। पाकिस्तान को वर्ष 1971 में भी मुंह की खानी पड़ी थी जब तत्कालीन पूर्वी बंगाल पर जबर्दस्ती कब्जा करने वाली पाक सेना को भारतीय सेना ने बिना शर्त घुटने टेकने को मजबूर किया था। उस दौर में भारतीय सेना के जोश को बढ़ाते देशभक्ति से परिपूर्ण कुलिश जी के अग्रलेखों के प्रमुख अंश:

भारत के सेनापति जनरल मानेकशा रोज पुकार-पुकार कर पाकिस्तानी जवानों को मौका दे रहे हैं कि वे हथियार डाल दें। उनकी अपील का असर भी हो रहा है। शनिवार को ही 1800 पाक सिपाहियों ने बांग्लादेश के अलग-अलग शहरों में हथियार डाले हैं और भारत ने उनको वीरोचित शरण दी है। चारों ओर भारत की सेना और मुक्तिवाहिनी से घिरे हुए असहाय पाकिस्तानी सैनिकों को स्वयं अपने प्राण प्यारे हैं और भारतीय सेना उन प्राणों को बचाने के लिए उन्हें अवसर दे रही है। वह शरणागत और निरीह को मारने के लिए कदापि तैयार नहीं है, लेकिन भाड़े के राजनयिकों ने इस तरह प्रचार शुरू किया है जैसे कि भारत उन सिपाहियों को विश्वास में लेकर गला काट रहा है और बचने का मौका भी नहीं दे रहा है। मजेदार बात तो यह है कि राजनयिक पाकिस्तान से कुछ भी नहीं कह रहे हैं। उन्होंने कभी यह नहीं पूछा कि पाकिस्तान ने अपनी फौजों को वहां क्यों भेजा था। जनरल याह्या खां ने चुने हुए अवामी लीग के नेताओं पर फौजी हमला क्यों कर किया और बांग्लादेश की जनता को गोलियों से क्यों भून दिया।
भारतीय सेना की तो यह सदाशयता है कि वह पाकिस्तानी सिपाहियों को बचने का मौका दे रही है, वरना कहीं मुक्तिवाहिनी का दांव लग गया, तो वह पाक फौजियों को कच्चा चबा जाएगी। मुक्तिवाहिनी और बांग्लादेश की उत्पीडि़त जनता पाक फौजियों से चुन-चुनकर बदला लेगी। अगर ये फौजी भारतीय सेना की शरण में आ जाते हैं, तो उनके साथ जिनेवा समझौते के अनुसार सम्मान का व्यवहार भी होगा और उन्हें अपने बाल-बच्चों में शामिल होने के लिये स्वदेश भी भिजवा दिया जाएगा। उनकी पैरवी के लिए किसी को मुंह खोलने की कोई जरूरत नहीं है। अगर किसी को अपनी भाड़े की प्रतिभा का ही प्रकाश करना है और मानवीय संवेदना के नाम पर मगर के आंसू ही बहाने हैं, तो आज ज. याह्या खां से अधिक उपयुक्त पात्र दूसरा कोई नहीं है । उसे बचाने की फिक्र करें जिसे नादान दोस्तों ने शहीद बनाने को पूरी तरह तैयार कर दिया है।
(12 दिसम्बर 1971 के अंक में ‘भाड़े की प्रतिभाएं’ अग्रलेख से)

अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहा

प्रधानमंत्री ने ठीक ही कहा है कि खतरा कम नहीं हो रहा, बल्कि बढ़ रहा है। यह खतरा कितना बढ़ जाएगा यह आज नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि हमें हर खतरे के लिए तैयार रहना है। दुश्मन को छोटा नहीं समझना ही यथार्थ नीति है, खास तौर से उस दुश्मन को जो कि अपने अस्तित्व के लिए आखिरी लड़ाई लड़ रहा है। कोई चारा नहीं देखकर जनरल याह्या खां ने अपने दोस्तों से मदद की पुकार की है। अपने दोस्त की मदद के लिए या उसे ज्यादा से ज्यादा मुसीबत में फंसाने के लिए ये दोस्त अब अकुला उठे हैं। कानून-कायदे, रीति-नीति, मर्यादा सब ताक में रखकर लड़ाई को इस हद तक भडक़ा देना चाहते हैं कि पाकिस्तान तो डूबे ही भारत भी बर्बाद हो जाए। भारत के लिए यह षडयंत्र आश्चर्यजनक एवं अप्रत्याशित नहीं है। भारत के दूरदर्शी नेता समझते थे कि पास-पड़ौस में जमा होने वाली इस मृत्यु-सामग्री का क्या परिणाम निकलने वाला है।

हमेशा मार खाई है

पा किस्तान की मदद करने वाले देश पहले भी वे ही थे जो आज हैं। उन्होंने पहले भी उसकी मदद करने में कोई कसर नहीं रखी और उसने पहले भी हमेशा मार खाई है। अब फर्क इतना ही हो गया है कि हम उसे माफ करने के लिए तैयार नहीं हैं और आज हम अकेले भी नहीं हैं। यह अपने आप में बहुत बड़ा फर्क है और इसी से याह्या खां को बेचैनी है। उनकी हाय-तौबा से फिर जंगी सामान मिल जाएगा और उसका उपयोग भी वहीं होगा जो पेटन टैंकों और सेबर जेटों का अब तक होता रहा है। सामान भी आएगा किधर से?

(कुलिश जी के अग्रलेखों पर आधारित पुस्तक ‘हस्ताक्षर’ से)