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बेहतर निगरानी के लिए पारदर्शिता जरूरी

मौजूदा दौर में ऑटोमोबाइल बाजार में करीब 44 प्रतिशत और संपत्ति पर ऋण देने में 52 प्रतिशत हिस्सेदारी इन्हीं एनबीएफसी की है।

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Sunil Sharma

Mar 16, 2018

Reserve bank of india

reserve bank of india

- केवल खन्ना, टिप्पणीकार

भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंक लोकपाल की तरह ही गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) पर निगरानी रखने के लिए योजना शुरू की है। इसके तहत एनबीएफसी द्वारा प्रदत्त सेवाओं में खामियों संबंधी शिकायतों का निशुल्क व त्वरित समाधान किया जाएगा। एनबीएफसी, कंपनी अधिनियम 1956 के तहत पंजीकृत होती है। यह कंपनी ऋण, अग्रिम पैसा, शेयर, स्टॉक, बॉन्ड, डिबेन्चर्स, किराये पर लेन-देन, खरीदने, बीमा या चिट फंड जैसे व्यवसाय करती हैं। ऐसी कोई भी कंपनी जिसका मुख्य व्यवसाय एक साथ या अलग-अलग किस्तों में धन जमा करना है, वह एनबीएफसी की श्रेणी में आती है।

निगरानी की यह योजना धन जमा करने वाली एनबीएफसी पर लागू होगी। अब से किसी भी एनबीएफसी का ग्राहक समस्या के समाधान के लिए निगरानी संस्था के समक्ष शिकायत कर सकता है। जैसे भुगतान ना होने, ब्याज के भुगतान में देरी, जमा का पुनर्भुगतान ना होने, ऋण समझौते में पारदर्शिता ना बरतने, अपनी गतिविधियों में कंपनी द्वारा आरबीआई के दिशानिर्देशों का पालन ना करने, उपभोक्ताओं को पूरी जानकारी दिए बिना उनसे शुल्क वसूलने और बकाया भुगतान के बावजूद प्रतिभूति दस्तावेजों को लौटाने में देरी करने सहित कई शिकायतों का निपटारा निगरानी तंत्र कर सकता है।

मौजूदा दौर में ऑटोमोबाइल बाजार में करीब 44 प्रतिशत और संपत्ति पर ऋण देने में 52 प्रतिशत हिस्सेदारी इन्हीं एनबीएफसी की है। पिछले दो सालों में इन कंपनियों के सकल ऋण में 16 फीसदी वृद्धि दर्ज गई जो बैंकों के ऋण विकास के लगभग दोगुने के समान है। छोटे उद्यमियों के बीच ऋण की काफी मांग है, जिनकी आमदनी का आकलन मुश्किल है और उनकी रिहायशी संपत्ति ही एकमात्र गारंटी है कॉर्पोरेट ऋण तथा सार्वजनिक व प्रोजेक्ट फाइनेंस को बढ़ावा देने वाले निजी बैंकों में बढ़ते एनपीए के कारण बढे दबाव के चलते ही एनबीएफसी कंपनियों में बढ़ोतरी हुई है। माना जा सकता है कि बैंकिंग क्षेत्र में गैर निष्पादित आस्तियों यानी एनपीए के कारण ही एनबीएफसी और ग्राहक केंद्रित बैंकों की घुसपैठ बढ़ी है। और तो और कार्पोरेट बैंक इन एनबीएफसी को फंड देने में अधिक इच्छुक दिखाई देते हैं। ये लघु एवं मध्यम उद्योगों को ऋण देने में बड़ी भूमिका निभा रही हैं।

यह कहना मुश्किल है कि इसका भविष्य क्या होगा लेकिन तकनीकी रूप से समृद्ध इन कंपनियों की कार्यशीलता पर भरोसा किया जा सकता है। इन कंपनियों के लिए निगरानी तंत्र बनाने का मकसद सिर्फ इतना सा है कि उनकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाई जा सके। पहले चरण में चेन्नई, कोलकाता, मुंबई और नई दिल्ली में यह निगरानी संस्था गठित की जाएगी।

इस नीति के तहत अपील करने की भी सुविधा दी गई है। इसके अनुसार शिकायतकर्ता और एनबीएफसी दोनों के पास निगरानी संस्था के खिलाफ अपील का अधिकार होगा। इस प्रकार कंपनियों पर यह तंत्र एक प्रकार से नियामक के तौर पर काम करेगा, जो कंपनी व उपभोक्ता दोनों के हित में है और स्वागत योग्य है।