मुखबा को गंगोत्री के तीर्थपुरोहित सेमवाल लोगों का गांव कहा जाता है। इस जगह पर उनकी चौदह पीढिय़ां रह चुकी हैं। इतना जानने के बाद मेरी भी इच्छा वहां जाने की हुई। गांव में घुसते ही मंदिर शुरू हो जाता है, जिसके दर्शन करने के उपरान्त गांव भी घूमा जा सकता है। इस पूरे गांव में चारो तरफ फूलों और जड़ी-बूटियों की खुशबू आती रहती है। उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से 75 किलोमीटर दूर गंगोत्री राजमार्ग पर स्थित मां गंगा के इस शीतकालीन प्रवास स्थल को मुख्य मठ भी कहा जाता है।
संजय शेफर्ड (ट्रैवल ब्लॉगर)
हिमालय पूरी तरह से रहस्यों से भरा हुआ है। आप जैसे-जैसे इसके करीब जाते हैं, यह रहस्य और भी गहराता जाता है। कुछ दिन पहले मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। मैंने गंगोत्री जाने की इच्छा जाहिर की, तो एक सज्जन ने कहा वह तो ठीक है, पर यहां से गंगा जी का मायका महज दो किलोमीटर दूर है। पहले वहां चले जाइए। गंगा जी का मायका? मैंने थोड़ा सा आश्चर्य भरे लहजे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि यहां पास में मुखबा गांव है, जहां पर गंगा माता सर्दियों के दौरान रहती हैं। अभी तो वे गंगोत्री में हैं, लेकिन दीवाली बाद जैसे ही सर्दियां शुरू होंगी, उनकी मूर्ति मुखबा गांव में स्थापित कर दी जाएगी और पूरे छह महीने तक गंगोत्री के तीर्थपुरोहित सेमवाल लोगों के द्वारा इसी गांव में उनकी पूजा अर्चना और आरती की जाएगी।
यही कारण है कि मुखबा को गंगोत्री के तीर्थपुरोहित सेमवाल लोगों का गांव कहा जाता है। इस जगह पर उनकी चौदह पीढिय़ां रह चुकी हैं। इतना जानने के बाद मेरी भी इच्छा वहां जाने की हुई। गांव में घुसते ही मंदिर शुरू हो जाता है, जिसके दर्शन करने के उपरान्त गांव भी घूमा जा सकता है। इस पूरे गांव में चारो तरफ फूलों और जड़ी-बूटियों की खुशबू आती रहती है। उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से 75 किलोमीटर दूर गंगोत्री राजमार्ग पर स्थित मां गंगा के इस शीतकालीन प्रवास स्थल को मुख्य मठ भी कहा जाता है। इस गांव में तकरीबन तीन से चार सौ परिवार रहते हैं। गांव के ज्यादातर घर परंपरागत तरीके से लकड़ी के बने हुए हैं। इस गांव से प्रकृति की छटा को देखना और हवा को महसूस करना अपने आपमें एक अलहदा अनुभव होता है। सर्दियों में एक अलग ही अनुभव और रोमांच होता है। पूरा क्षेत्र बर्फ से अटा होता है और ज्यादातर लोग गांव छोड़कर नीचे की तरफ वाले गांव में चले जाते हैं। इस गांव में रौनक फिर कहीं जाकर मार्च के बाद से शुरू होती है और कुदरत इस पूरे इलाके में खूबसूरत रंग भरने शुरू कर देती है। गांव में चारों ओर जड़ी बूटियों की कोपलें फूटने लगती हैं। फलदार पेड़-फूलों से लकदक हो जाते हैं। जैसे ही मई-जून का महीना शुरू होता है, चारों ओर हरियाली पसर जाती है।
इस गांव में सेब के बागान खूब हैं और ज्यादातर लोगों की आजीविका का यही साधन भी हैं। थोड़ी बहुत राजमा की खेती भी होती है और बाकी का सारा गांव पूजा-पाठ कराने का धार्मिक कार्य करता है। इसी गांव से होकर ऊपर मेरु और सुमेरु भी जाया जा सकता है, जहां पर सुबह के समय सोने के समान पहाड़ दिखाई देते हैं। गांव से ऊपर रास्ते में एक झरना भी है, जहां पर सैलानी जाना पसंद करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वानप्रस्थ के दौरान विचरण करते हुए पांडव मुखबा पहुंचे थे और यहां पर उनका प्रवास रहा था।