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असहमति के प्रति सहिष्णुता घटने से बढ़ रही ‘ट्रोलिंग’

ट्रोल संस्कृति का मूल कारण तकनीक नहीं, बल्कि उसका गैर-जिम्मेदार उपयोग है। जब समाज में असहमति के प्रति सहिष्णुता घटती है और संवाद की जगह अपमान ले लेता है, तब ट्रोलिंग पनपती है। इसलिए डिजिटल साक्षरता को उतना ही महत्त्व देना होगा जितना तकनीकी सुरक्षा को।

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भारत

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Opinion Desk

Jun 08, 2026

say no trolling

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बलवंत राज मेहता,वरिष्ठ पत्रकार

सोशल मीडिया ने संवाद को नई शक्ति दी है। इसने अभिव्यक्ति के अवसरों का विस्तार किया और समाज के हर वर्ग को अपनी बात रखने का मंच उपलब्ध कराया। लेकिन इसी के साथ एक ऐसी प्रवृत्ति भी विकसित हुई जिसने स्वस्थ संवाद को चुनौती दी है। ट्रोलिंग, साइबर बुलिंग और संगठित ऑनलाइन उत्पीडऩ आज केवल डिजिटल समस्या नहीं रह गए हैं, बल्कि सामाजिक और लोकतांत्रिक चिंता का विषय बन चुके हैं। असहमति व्यक्त करना लोकतंत्र का स्वाभाविक अधिकार है, किंतु जब असहमति अपमान, धमकी, चरित्रहनन और मानसिक प्रताडऩा का रूप धारण कर ले, तब वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं बल्कि सामाजिक विकृति बन जाती है। देश में साइबर अपराधों और ऑनलाइन उत्पीडऩ की घटनाओं में लगातार वृद्धि ने इस चिंता को और गहरा किया है। फर्जी प्रोफाइल, मॉफ्र्ड तस्वीरें, अपमानजनक टिप्पणियां, संगठित ट्रोल समूह और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से तैयार की जा रही भ्रामक सामग्री ने स्थिति को जटिल बना दिया है। इसका प्रभाव केवल सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों तक सीमित नहीं है। विद्यार्थी, महिलाएं, शिक्षक, पत्रकार और सामान्य नागरिक भी इसके शिकार बन रहे हैं।

जागरूकता फैलाने का प्रयास
समस्या की गंभीरता को देखते हुए विभिन्न राज्यों ने अपने-अपने स्तर पर पहलें शुरू की हैं। उत्तर प्रदेश ने मिशन शक्ति के माध्यम से महिलाओं की सुरक्षा, साइबर जागरूकता और ऑनलाइन उत्पीडऩ के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया है। इसके साथ साइबर पुलिसिंग को मजबूत किया गया है और जन-जागरूकता कार्यक्रमों को गांवों तक पहुंचाया गया है। हाल ही में राज्य पुलिस नेतृत्व ने अपराध नियंत्रण के साथ साइबर अपराधों में कमी लाने में मिशन शक्ति और विशेष साइबर पुलिसिंग की भूमिका को रेखांकित किया है। इसी राज्य में ऑपरेशन जागृति जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से स्कूलों, महाविद्यालयों और ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों लोगों तक पहुंचकर साइबर उत्पीडऩ, ऑनलाइन सुरक्षा और जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार के बारे में जागरूकता फैलाने का प्रयास किया गया है।

विशेष साइबर इकाइयां सक्रिय
तेलंगाना, विशेषकर हैदराबाद और साइबराबाद क्षेत्र में, साइबर अपराधों की रोकथाम के लिए विशेष साइबर इकाइयां सक्रिय की गई हैं। वहां नियमित जन-जागरूकता अभियानों, सोशल मीडिया निगरानी और त्वरित शिकायत निस्तारण व्यवस्था पर बल दिया गया है। महाराष्ट्र ने महाराष्ट्र साइबर विभाग के माध्यम से साइबर अपराध जांच, डिजिटल फॉरेंसिक और जन-जागरूकता कार्यक्रमों को मजबूत किया है। राज्य ने महा साइबर सेफ जैसे डिजिटल सुरक्षा प्रयास भी शुरू किए हैं, जिनका उद्देश्य नागरिकों को ऑनलाइन खतरों के प्रति सचेत करना है। हरियाणा में वर्षों पहले प्रारंभ किया गया साइबर सेफ अभियान विद्यालयों और महाविद्यालयों तक पहुंचा, जहां छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों को साइबर सुरक्षा तथा ऑनलाइन जिम्मेदारी का प्रशिक्षण दिया गया। यह पहल इस बात का उदाहरण है कि जागरूकता अभियान केवल कानून से अधिक प्रभावी दीर्घकालिक समाधान प्रदान कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ ने भी ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर अपराधों के विरुद्ध राज्यव्यापी जागरूकता अभियान चलाकर नागरिकों तक साइबर सुरक्षा संदेश पहुंचाने का प्रयास किया है। वहीं उत्तर प्रदेश के अमरोहा से प्रारंभ साइबर वॉरियर्स कार्यक्रम में देश के 22 राज्यों के युवाओं को प्रशिक्षित कर साइबर जागरूकता का जन-आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की गई। इनमें राजस्थान सहित अनेक राज्यों के युवा शामिल रहे। राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रयास जारी हैं। गृह मंत्रालय के तहत स्थापित भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आइ4सी), राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और 1930 हेल्पलाइन साइबर अपराधों की रोकथाम और शिकायत निस्तारण के लिए महत्त्वपूर्ण तंत्र बन चुके हैं। स्टे सेफ ऑनलाइन और डिजिटल शक्ति जैसे अभियान नागरिकों, विशेषकर महिलाओं और युवाओं, को सुरक्षित डिजिटल व्यवहार के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

ट्रोल संस्कृति का कारण तकनीक नहीं, बल्कि उसका गैर-जिम्मेदार उपयोग
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि केवल कानून और तकनीक पर्याप्त नहीं हैं। ट्रोल संस्कृति का मूल कारण तकनीक नहीं, बल्कि उसका गैर-जिम्मेदार उपयोग है। जब समाज में असहमति के प्रति सहिष्णुता घटती है और संवाद की जगह अपमान ले लेता है, तब ट्रोलिंग पनपती है। इसलिए डिजिटल साक्षरता को उतना ही महत्त्व देना होगा जितना तकनीकी सुरक्षा को। विद्यालयों में डिजिटल नागरिकता की शिक्षा, परिवारों में जिम्मेदार ऑनलाइन व्यवहार की चर्चा और सोशल मीडिया मंचों की अधिक जवाबदेही समय की आवश्यकता है। भारत डिजिटल महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। लेकिन डिजिटल प्रगति तभी सार्थक होगी जब उसके साथ डिजिटल शिष्टाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व भी विकसित हो। स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान विचारों के संघर्ष से होती है, व्यक्तियों के अपमान से नहीं। ट्रोल संस्कृति पर अंकुश केवल कानून व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सभ्य समाज और स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद की रक्षा का प्रश्न है। यदि समाज, सरकार, तकनीकी कंपनियां और नागरिक मिलकर इस चुनौती का सामना करें, तो सोशल मीडिया पुन: रचनात्मक संवाद का मंच बन सकता है, अन्यथा वह डिजिटल भीड़तंत्र का अखाड़ा बनने का जोखिम उठाता रहेगा।