
डॉ. राजेश कुमार व्यास
संस्कृतिकर्मी, कवि और कला समीक्षक
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नृत्य देह का गान है। देह का राग भी। ऐसा जो मन को रंग दे। नर्तक बहुतेरी बार देह से परे चला जाता है। रह जाता है, बस उसका नृत्य! उदय शंकर ऐसे ही थे। उन्होंने कलाओं के अंत:संबधों में नृत्य का लालित्य रचा। वह नृत्य करते तो हवा में तैरती-उड़ती देह पश्चिमी बैले की अनुभूति कराती है और लोक कलाकारों की स्वतंत्र दृष्टि वहां मिलती है। शास्त्रीयता में गूंथा गया उनका नृत्य विचार का भी उजास है।
यह मान लिया गया है कि परम्परागत जो है, उसका कुशलता से निर्वहन ही नृत्य-निपुणता है। पर उदय शंकर ने इस मिथक को तोड़ा। उन्होंने स्थापित किया, नृत्य देह का गान है। भरतनाट्यम, कथकली, कथक, ओडिसी, लोकनाट्य गवरी आदि के घोल में उन्होंने नृत्य की अनूठी भारतीयता रची। उन्होंने पश्चिम के बैले के तत्व ग्रहण किए पर अनुकरण नहीं किया। मंदिरों की बाह्य दीवारों पर उत्कीर्ण मुद्राओं को उन्होंने जीवंत किया। उनका नृत्य कलाओं के अंत:संबंधों का भी उजास
है। इटली की मूर्तिकार एलिस बोनर ने ज्यूरिख में 1926 में उनका नृत्य देखा। पाया कि उदय शंकर के शरीर में चित्र, पत्थर की प्रतिमाओं की थिरकन है। एलिस उनके साथ भारत आई और
फिर यहीं की होकर रह गई। उसने उनके बहुत से स्कैच और मिट्टी के मॉडल बनाए। एक नर्तक कैसे मूर्तिकार, चित्रकार को अपनी कला से प्रेरित कर भारतीयता में गूंथ देता है—यह बनारस स्थित ऐलिस बोनर कला वीथिका में प्रवेश कर समझा जा सकता है।
उदय शंकर, पंडित रविशंकर के बड़े भाई थे। रॉयल कॉलेज ऑफ आट्र्स से उन्होंने 1923 में पेंटिंग में शिक्षा प्राप्त की। लंदन की आर्ट गैलरी में प्रदर्शित उनकी दो कलाकृतियां पुरस्कृत भी हुईं। इसी दौरान भारत की यात्रा कर लौटी अन्ना पावलोवा ने उदय शंकर को देखा। उन्हें लगा, अजंता में चित्रित किसी देवता ने मानव शरीर धारण कर लिया है। वह उनकी देह-सौष्ठव पर इस कदर मुग्ध हुई कि तुरंत उन्हें राधा-कृष्ण वाले बैले में कृष्ण बनने का प्रस्ताव दे दिया। उनके शिक्षक विख्यात शिल्पी विलियम राटेंस्टाइन नहीं चाहते थे वह नृत्य में जाएं पर नृत्य का अपूर्व उदय हो चुका था। पेरिस में उनके उस दौरान जो नृत्य हुए उनमें आंखों, हथेलियों, उंगलियों और देह-भंगिमा की विरल गत्यात्मकता ने एक नवीन नृत्य शैली को जन्म दिया — उदय शंकर शैली। देह से भावों की, भंगिमाओं का अनूठा भव। अमला शंकर ने उदय शंकर के नृत्य पर मोहित होकर ही उनसे विवाह किया। अमला लिखती हैं, ‘शिव ताण्डव तथा अग्निपूजा नृत्य देखकर मैं पागल हो गई। कोई नृत्य इतना सुंदर हो सकता है— यह मैंने पहली बार समझा।’
उदय शंकर ने विश्व की बेहतरीन ‘कल्पना’ फिल्म भी बनाई। अमला शंकर के साथ 154 मिनट की यह फिल्म सुमित्रा नंदन पंत की कविता पर आधारित है। इसके कैमरामैन थे— के. रामनाथ। दृश्यों की छन्दोमय गतिशीलता में यह फिल्म दृश्य और ध्वनि बिम्बों का अद्भुत लोक लिए है। इसमें दौ सौ वाद्यों का प्रयोग हुआ। ख्यात पश्चिमी संगीतज्ञ लिओपोल्ड स्टोकव्हिस्की ने इसमें प्रयुक्त तबला सुना तो दंग रह गए। कहा, जहां एक ही वाद्य यंत्र से इतनी तरह की आवाजें निकलती हैं, दुनिया में उस देश की कोई जोड़ी नहीं।
एक दफा पेरिस से जब उदय शंकर भारत आए तो मंदिरों में घूमते हुए केरल के गुरुवायूर में कथकली देखा। वह भौचक्के रह गए। उन्होंने लिखा, ‘बिना जाने, बिना देखे मैं अपने नृत्य में यह लाता रहा हूं।’ उनका नृत्य ऐसा ही था। लोक की गवेषणा, ध्यान का ज्ञान। इसी 26 सितंबर को उनसे बिछोह को 47 साल हो जाएंगे। पर नृत्य की उनकी भारतीय दृष्टि सदा जीवंत रहेगी।
Published on:
22 Sept 2024 10:55 pm
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