
vip culture
वीआईपी संस्कृति के बारे में सुनते-सुनते कान पक गए लेकिन संस्कृति है कि देश से विदा होने का नाम ही नहीं ले रही। इसलिए क्योंकि इस संस्कृति से परेशान तो सब हैं लेकिन इसे बनाए रखने वाली लॉबी इतनी सशक्त है कि वह इसे किसी भी कीमत पर छोडऩा नहीं चाहती। हां कभी-कभी दिखावे के लिए जरूर इस पर प्रहार करती नजर आ जाती है। रेलवे ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के घर पर काम करने वाले रेल कर्मियों को ‘बेगार’ से मुक्त करने का फैसला किया है।
बताया जाता है कि लगभग ३० हजार रेलकर्मी वरिष्ठ अधिकारियों के घरेलू काम निपटाने में लगे हुए थे। इससे पहले भी केन्द्र सरकार ‘वीआईपी संस्कृति’ खत्म करने के लिए किस्तों में कई फैसले ले चुकी है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सरकार एक ही झटके में इस बदनाम संस्कृति को अलविदा कह दे? क्यों कभी रेलवे तो कभी दूसरे विभागों को अलग-अलग आदेश जारी करने पड़ें।
रेलवे हो, पुलिस महकमा या कोई दूसरे विभाग सब जगह ऐसी बेगार लेने पर पाबंदी लगाने में परेशानी क्या है? कितनी सरकारें, कितने आदेश निकाल चुकी हैं लेकिन पांच सितारा होटलों में होने वाली सेमीनार और बैठकें बंद नहीं हुईं। जरूरत हो या नहीं लेकिन अधिकारियों के विदेश दौरे हर सरकारों में धड़ल्ले से चलते रहते हैं। संसदीय और विधानसभा समितियों के पांच सितारा दौरों की खबरें सामने आती रहती हैं। सांसद-विधायक ऐसे दौरों में जाते हैं तो पत्नियों-बच्चों को साथ ले जाना नहीं भूलते। अधिकांश दौरों में बैठकों के नाम पर काम कम और सैर-सपाटा अधिक देखने को मिलता है। बड़े अधिकारियों के घर तीन-चार सरकारी कार होना आम बात है।
सवाल है कि इस संस्कृति के अभ्यस्त हो चुके अधिकारी इसे रोकने की पहल क्यों करेंगे? ये इच्छाशक्ति सरकार में बैठे मंत्रियों को ही दिखानी पड़ेगी। मंत्री भी साहस तभी दिखा पाएंगे, जब वे स्वयं वीआईपी संस्कृति से मुक्त होने की सोचें। जिस देश में करोड़ों लोग आज भी पेट भरने को मोहताज हों, फुटपाथ पर सोते हों, बिना इलाज के दम तोड़ देते हों, उस देश में वीआईपी संस्कृति कब की खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन मजे की बात कि अब तक यह वीआईपी संस्कृति चल ही नहीं बल्कि दौड़ रही है।

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