
भारत में खेलों को लेकर जिम्मेदार नेताओं के मौसमी या क्षणिक बयान आने लगे हैं, जिनमें दिखावा ज्यादा है और अफसोस कम। दरअसल एशियाई खेलों में प्रदर्शन ऐसा नहीं हो रहा है कि केन्द्र सरकार ढिंढोरा पीट सके, इसलिए खेलों में सुधार की पारंपरिक चर्चा शुरू कर दी गई है। सूचना प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने बयान दिया है कि अगले वर्ष तक स्कूलों में पाठ्यक्रम आधा हो जाएगा और खेल की कक्षा जरूरी हो जाएगी। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर भी कई बार संकेत दे चुके हैं।
इनसे पहले भी कई बार केन्द्रीय मंत्रियों ने खेलों में क्रांति लाने की बात कही थी, लेकिन पदक तालिका से लोगों का ध्यान हटते ही जिम्मेदार नेता फिर खेल से खिलवाड़ शुरू कर देते हैं। कोई पूछे और देखे तो सही कि जापान, ईरान जैसे देश कैसे आगे निकल गए। इन देशों के लोग जब पदक तालिका में भारत की उपस्थिति देखते होंगे, तो क्या सोचते होंगे? क्या भारत सरकार और भारत के लोगों ने अभी भी खेलों के महत्त्व को नहीं समझा है?
भारत सरकार ऐसा मान रही है कि देश में बच्चों पर पढ़ाई का बोझ इतना ज्यादा है कि उनके पास खेलने के लिए समय नहीं बचता है, तो पढ़ाई को आधा करना होगा। यदि शिक्षा विशेषज्ञ ऐसा मानते हैं, तो काश, यह काम पहले हो गया होता। यह काम चुनावी वर्ष के लिए नहीं छोडऩा चाहिए था। हालांकि महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि पाठ्यक्रम आधा करने से बहुत फायदा नहीं होने वाला, क्योंकि एनसीईआरटी को देश के ज्यादातर स्कूल नहीं मानते। ऐसे निजी स्कूलों का पाठ्यक्रम और भी दिखावटी व जटिल होता है। ऐसे निजी स्कूलों को जब सरकार एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम लागू करने के लिए मजबूर नहीं कर पाई, तो उसका आधा पाठ्यक्रम इनमें कैसे लागू होगा?
केन्द्र सरकार का दूसरा कदम होगा- खेल की क्लास को जरूरी बनाना। यह भी एक मुश्किल काम है। नियम तो यह भी है कि बिना खेल मैदान या खेल सुविधा के स्कूल नहीं खुल सकते, लेकिन उसकी पालना नहीं होती है। देश में ज्यादातर निजी स्कूल ऐसे हैं, जिनके पास खेल मैदान नहीं है, वे कैसे खेल को अनिवार्य बनाएंगे? क्या उन स्कूलों को बंद कर दिया जाएगा, जिनके पास मैदान नहीं है या जिनके पास इंडोर खेल सुविधा भी नहीं है? हमारी सरकारों का शिक्षा व निजी स्कूलों के प्रति जो लचीला, नीतिहीन ढर्रा रहा है, उसमें वे निजी स्कूलों पर कड़ाई नहीं कर सकतीं। यदि कड़ाई नहीं होगी, तो स्कूल न तो पहले पदक विजेता देते थे और न आगे देंगे। जिन बच्चों में व्यक्तिगत प्रतिभा और लगन होगी, वही आगे बढ़ते थे और आगे भी ऐसा ही होगा।
खेलों का सच बहुत स्याह है। पदक तालिका में भारत की कमजोर उपस्थिति देख नेताओं को ही क्यों, किसी भी स्कूल संचालक या शिक्षक को भी शर्म नहीं आती। पहले जिम्मेदारों को जिम्मेदारी का अहसास तो हो। केवल कागजी प्रस्तावों और सुधारों से भारत का सम्मान नहीं बढऩे वाला। पहले देश के सभी स्कूलों को नए पाठ्यक्रम व मैदान के साथ तैयार करना होगा, उसके बाद ही देश का नाम खेल पदक तालिकाओं में ऊपर चमकेगा।

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