23 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

आर्द्रभूमि हैं ‘धरती की किडनी’ और पर्यावरण की रक्षक

विश्व आर्द्रभूमि दिवस: 2 फरवरी जलाशयों को पुनर्जीवित और पुनस्र्थापित करना है इस वर्ष की थीम

3 min read
Google source verification

image

Patrika Desk

Feb 02, 2023

आर्द्रभूमि हैं ‘धरती की किडनी’ और पर्यावरण की रक्षक

आर्द्रभूमि हैं ‘धरती की किडनी’ और पर्यावरण की रक्षक

शैलेंद्र यशवंत
पर्यावरणीय विषयों के जानकार और सामाजिक कार्यकर्ता
................................................................................

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस के रूप में चिह्नित किया है। इसका उद्देश्य है क्षय होती आर्द्रभूमि को पुनर्जीवित कर पुन: स्थापित करना। एक ओर प्राकृतिक रहवास की हानि के सवाल पर जहां दुनिया का ध्यान अक्सर जंगलों, खास तौर पर वर्षावनों पर केंद्रित रहता है, वहीं हम एक अन्य महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी गंवाते जा रहे हैं द्ग हमारे जलाशय, वह भी बहुत तेजी से।

जलाशयों की व्यापक परिभाषा में ताजा पानी व समुद्री जल दोनों ही शामिल हैं। साथ ही तटीय पारिस्थितिकी भी; जैसे झीलें, नदियां, भूमिगत जलभंडार, दलदल, आर्द्र चारागाह, मरुउद्यान, नदी का मुहाना, डेल्टा और ज्वार-भाटा मैदान, मैनग्रोव वृक्ष क्षेत्र एवं अन्य तटीय इलाके, मूंगा चट्टान एवं मानव निर्मित स्थल जैसे मत्स्य तालाब, चावल के खेतों में भरा पानी और लवण कुंड। आर्द्रभूमि इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि ये जल गुणवत्ता को संरक्षित व संशोधित करती हैं, मछली व अन्य जलचर उपलब्ध करवाती है, बाढ़ का पानी संग्रहित करती हैं और शुष्क अवधि में स्थलीय जलस्तर बनाए रखती हैं। कई आर्द्रभूमि ऐसी होती हैं जो साल भर आर्द्र नहीं रहतीं, क्योंकि मौसम के अनुसार उनका जलस्तर बदलता रहता है। अति वर्षा के दिनों में आर्द्रभूमि बाढ़ के पानी को अवशोषित कर लेती हैं और उसकी गति धीमी कर देती हैं। इस प्रकार ये जान-माल की क्षति कम करने में सहायक हैं। आर्द्रभूमि पानी के अतिरिक्त पोषक तत्व, तलछट व अन्य प्रदूषक तत्व अवशोषित कर लेती हैं, इससे पहले कि वह नदियों, झीलों व अन्य जलाशयों में पहुंचे। आर्द्रभूमि जलवायु परिवर्तन के वैश्विक खतरे का स्वाभाविक समाधान हैं। ये कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करती हैं। इस प्रकार वैश्विक तापमान कम करने और प्रदूषण घटाने में सहायक हैं। इसीलिए इन्हें अक्सर ‘धरती की किडनी’ कहा जाता है। दलदल युक्त जमीन में कार्बन भंडारण क्षमता विश्व के समस्त जंगलों की सकल कार्बन भंडारण क्षमता से दोगुनी होती है। पर शुष्क व नष्ट होने पर आर्द्रभूमि भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन करती हैं। आर्द्रभूमि बाढ़, सूखा, हरिकेन एवं सुनामी तूफानों के दुष्प्रभावों से हमें बचाती हैं, और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन विकसित करने में भी मदद करती हैं।

आर्द्रभूमि जंगलों के मुकाबले तीन गुना अधिक तेजी से विलुप्त हो रही हैं और पृथ्वी की सर्वाधिक संकटग्रस्त पारिस्थितिकी हैं। 1970 से लेकर अब तक मात्र 50 वर्षों में दुनिया की 35 प्रतिशत आर्द्रभूमि विलुप्त हो चुकी हैं। जिन मानवीय गतिविधियों के चलते आर्द्रभूमि का क्षय हुआ है, वे हैं द्ग कृषि एवं निर्माण कार्यों के लिए जलनिकासी व भराव, प्रदूषण, अत्यधिक मछली पकडऩा व संसाधनों का अत्यधिक दोहन, हमलावर प्रजातियां और जलवायु परिवर्तन। जो आर्द्रभूमि विश्वभर में जैव विविधता और मानव के लिहाज से महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं, उन्हें रामसर स्थल कहा जाता है।

स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में भारत ने 75 रामसर स्थलों की घोषणा की है। आज एशिया में सर्वाधिक रामसर स्थल भारत में ही हैं। राजस्थान का केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान, गुजरात का नलसरोवर, केरल की अष्टमुडी झील, मध्यप्रदेश की भोज आर्द्रभूमि, ओडिशा का भितरकनिका वन, मणिपुर की लोकताक झील, प. बंगाल की सुंदरबन आर्द्रभूमि, तमिलनाडु में मन्नार की खाड़ी रिजर्व और महाराष्ट्र की लोनार झील भारत की प्रमुख आर्द्रभूमि हैं जो दुनिया की जानी-मानी आर्द्रभूमियों में गिनी जाती हैं। वैटलैंड्स इंटरनेशनल दक्षिण एशिया के अनुसार, भारत की करीब 30 प्रतिशत आर्द्रभूमि पिछले तीन दशकों में विलुप्त हो चुकी है। इसकी मुख्य वजह अवैध निर्माण, अस्थायी शहरीकरण, कृषि विस्तार और प्रदूषण रहे। चेन्नई की 90 प्रतिशत आर्द्रभूमि शहरीकरण की भेंट चढ़ गई और वहां जल सुरक्षा व बिगड़ते पर्यावरण की समस्या बढ़ गई। हैदराबाद की 55 फीसदी आर्द्रभूमि कुप्रबंधन, बढ़ते प्रदूषण और अनियंत्रित शहरी विकास के चलते खराब हो गई। मुंबई की 71 फीसदी और दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की 38 फीसदी आर्द्रभूमि निर्माण और प्रदूषण के चलते खराब हो गई। आर्द्रभूमि की हानि का कुचक्र, आजीविका संकट और गहराती गरीबी, ये सब आर्द्रभूमि को बेकार भूमि समझने का ही परिणाम है, जबकि ये रोजगार, आय और आवश्यक पारिस्थितिकीय सेवाओं के जीवन प्रदायी स्रोत हैं। सरकार व समुदायों को आर्द्रभूमि की कद्र करने और प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित करना बड़ी चुनौती है।

गत सप्ताह केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिए कि हैदरपुर आर्द्रभूमि से और अधिक जलनिकासी न होने दें और अगर किसानों के दबाव में आकर जलनिकासी करनी है तो सुनिश्चित करें कि केवल तभी की जाए जब प्रवासी पक्षी वहां नहीं रह रहे हों। प्रचलित धारणा यह है कि आर्द्रभूमि में सदा पानी होगा। पर जो तथ्य सर्वविदित नहीं है, वह यह कि आर्द्रभूमि में सालभर पानी रहे, यह जरूरी नहीं। ये एक प्रकार से जल अवशोषित करने वाले स्पंज की तरह हैं जो भूमिगत जल भंडार को रिचार्ज करने का काम करती हैं। आर्द्रभूमि जलीय रूप से एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं। कुछ भूमि अन्य के मुकाबले अधिक जल रिचार्ज करती हैं तो कुछ जमीन के ऊपर पानी संचय करके रखती हैं जो जीवों के काम आता है। इस साल की थीम है द्ग ‘आर्द्रभूमि को पुनर्जीवित करना व पुन: स्थापित करना’, क्योंकि भलीभांति पुन: स्थापित की गई आर्द्रभूमि मौलिक प्राकृतिक आर्द्रभूमि के समान ही कारगर होती हैं।