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पाकिस्तान के बलूचिस्तान में 50 लाख से ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली द्रविड़ भाषा ब्राहुई की निरंतर मौजूदगी भी संकेत है कि द्रविड़ लोग आर्यों के दबाव में पूरब और दक्षिण की ओर गए।

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Sunil Sharma

Aug 20, 2018

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- मोहन गुरुस्वामी, नीति विश्लेषक

भारत के आदिवासी ही यहां के मूलनिवासी हैं। बाकी चाहे आर्य हों या द्रविड़, हिंदू या मुसलमान, राजपूत या जाट, सब बाहर से आए हुए हैं। इनका दावा कमोबेश उन यूरोपीय लोगों के जैसा है जो दक्षिण अमरीका में जाकर बस गए। दक्षिण अमरीका को उपनिवेश बनाने वालों ने बेशक एक नई पहचान को जन्म दिया और दुनिया ऐसा मानती भी है, लेकिन उन्हें वहां का मूलनिवासी मान लेना वैसा ही है जैसे आप दक्षिण अफ्रीका में किसी अफ्रीकीभाषी गोरे को मूल अफ्रीकी मान लें। इतना स्पष्ट है कि आर्य और द्रविड़ बाहर से आए थे जो अपने मवेशियों के लिए चरागाहों और खेती के लिए उर्वर जमीनों की तलाश में पूरब की ओर यात्रा करने निकले थे। बस यहीं पर उग्र-राष्ट्रवादियों और रूढि़वादी हिंदुओं के साथ मामला फंस जाता है, जो इस देश पर एक नई वंशावली थोपने में लगे हुए हैं।

हम कौन हैं, यह जानने के वैज्ञानिक तरीके मौजूद हैं। हाल ही में जेनेटिक्स यानी आनुवांशिकी में हुई नई खोजों ने विभिन्न क्षेत्र के लोगों के बीच संबंध तलाशने का काम संभव बना दिया है। नीहार रंजन के इस कथन को न केवल भारतीय अध्ययन सही साबित करते हैं कि आदिवासी ही यहां के मूलनिवासी थे, बल्कि उटा यूनिवर्सिटी के आनुवांशिकी वैज्ञानिक डॉ. माइकल बमशाद ने जीनोम रिसर्च के जून 2001 अंक में साफ लिखा कि आधुनिक उच्चजाति के भारतीयों के पूर्वज यूरोपीय लोगों के ज्यादा सदृश हैं जबकि निम्नजाति की आबादी एशियाई लोगों के ज्यादा समान है।

आंध्र यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक बीबी राव, एम नायडू, बीवीआर प्रसाद और अन्य ने पाया है कि आनुवांशिक गठन के लिहाज से दक्षिण और उत्तर भारत के बीच विशिष्ट अंतर मौजूद हैं। आनुवांशिक चिह्नों में अंतर के बावजूद आर्य और द्रविड़ शायद एक-दूसरे से उतना भी दूर नहीं हैं। भाषाविज्ञानी लंबे समय से इस बात से सहमत हैं कि अंग्रेजी, डच, जर्मन और रशियन प्रत्येक, भारोपीय भाषा परिवार की शाखाएं हैं जिसमें जर्मेनिक, स्लाविक, सेल्टिक, बाल्टिक, इंडो-ईरानी और अन्य भाषाएं आती हैं। ये सभी ग्रीक, लातिनी या संस्कृत जैसी किसी ज्यादा प्राचीन भाषा की वंशज हैं।

भाषाविज्ञानियों ने बाद में आई इन तमाम भाषाओं के लिए एक प्राचीन भाषा को पुनर्निर्मित किया है। इसे वे प्रोटो-भारोपीय या पीआइई कहते हैं। अमरीका की वेन स्टेट यूनिवर्सिटी के डॉ. अलेक्सिस मनास्टर रेमर ने पीआइई और दो अन्य भाषा समूहों उरालिक और आल्टेइक के बीच संबंध खोज निकाले हैं। उनका कहना है कि ये तीनों समूह एक और पुरानी भाषा नोस्ट्राटिक से निकले हुए हैं। यदि वे सही हैं, तो सभी भारतीय भाषाएं, चाहे द्रविड़ हों या संस्कृतजन्य, सब 12000 साल पहले बोली जाने वाली नोस्ट्राटिक से आई हैं।

भाषाविज्ञानियों के मुताबिक भाषा केवल बोलने या सुने जानी वाली चीज नहीं है क्योंकि हम मुद्राओं से भी संचार कर सकते हैं। हवाई यूनिवर्सिटी के डॉ. डेरक बिकर्टन के अनुसार ‘भाषा का सारतत्व शब्द और व्याकरण है, जो मस्तिष्क में एक मिश्रित तंत्र की उपज है।’

एक अग्रणी फिनिश विद्वान डॉ. आस्को पारपोला बुनियादी सवाल उठाते हैं कि क्या संस्कृत एक द्रविड़ भाषा है और इसके पक्ष में पर्याप्त साक्ष्य भी देते हैं। विद्वानों ने तमिल, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़ और तुलु तथा फिन्नो-उग्री भाषाओं के शब्दों व व्याकरण के बीच सादृश्यता पर लिखा है। इन द्रविड़ भाषाओं का आधुनिक संस्करण जहां संस्कृत से पर्याप्त प्रभावित है वहीं प्राचीन लेखन में ‘एक भी संस्कृत का शब्द नहीं मिलता’।

दूसरी ओर, कुछ जानकारों का कहना है कि द्रविड़ भाषाओं में कई ऐसे परिवद्र्धित शब्द हैं जो ऋग्वेद में पाए जाते हैं। न केवल संस्कृत, बल्कि लातिनी और ग्रीक में भी द्रविड़ भाषाओं के तमाम परिवद्र्धित शब्द मौजूद हैं। मसलन, चावल के लिए प्रोटो-द्रविड़ शब्द अरिसि लातिनी व ग्रीक के ओरिजा के समान है जबकि अदरक को तमिल में इंसिवर कहते हैं और जर्मन में इंजिवर तथा ग्रीक में जिंजिबेरिस। इससे यह सिद्धांत काफी पुष्ट होता है कि मूल द्रविड़ लोग मेडिटेरेनियन और आर्मेनॉइड थे, जो ईसा पूर्व चौथी सदी में सिंधु घाटी में आ बसे।

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में 50 लाख से ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली द्रविड़ भाषा ब्राहुई की निरंतर मौजूदगी भी इस बात का संकेत है कि द्रविड़ लोग आर्यों के दबाव में पूरब और दक्षिण की ओर गए।

ईपीडब्लू के 14 दिसंबर, 2002 के अंक में संतोष कुमार खरे ने हिंदी के मूल स्रोतों पर लिखा, ‘हिंदी और उर्दू के दो विशिष्ट और भिन्न भाषाएं होने की अवधारणा 19वीं सदी के पूर्वाद्र्ध में फोर्ट विलियम कॉलेज में पैदा हुई। इसी हिसाब से उनके भाषाई और साहित्यिक आख्यान बने। उर्दू ने फारसी/अरबी से उधार लिया जबकि हिंदी ने संस्कृत से।’ यह उभरते हुए मध्यवर्गीय हिंदू और मुस्लिम/कायस्थ समूहों के संकीर्ण प्रतिस्पर्धी हितों की प्रतिनिधि बन गई।

चुभने वाला असल निष्कर्ष यह है कि आधुनिक हिंदी या खड़ी बोली दरअसल ईस्ट इंडिया कंपनी की नकली गढऩ थी जिसने उर्दू के व्याकरण और लहजे को कायम रखते हुए उसे ‘विदेशी और रूढ़’ शब्दों से मुक्त कर दिया और उनकी जगह संस्कृत के पर्यायवाची शामिल कर लिए।