5 अप्रैल 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

आपकी बात, खर्चीले विवाह समारोहों का क्या असर हो रहा है?

पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आईं। पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।

2 min read
Google source verification

image

Gyan Chand Patni

Jan 15, 2024

आपकी बात, खर्चीले विवाह समारोहों का क्या असर हो रहा है?

आपकी बात, खर्चीले विवाह समारोहों का क्या असर हो रहा है?

दिखावे का प्रचलन

आजकल विवाह समारोहों में दिखावे का ज्यादा प्रचलन है। नेताओं व धनाढ्य वर्ग द्वारा की जा रही खर्चीली शादियों का समाज पर नकारात्मक असर हो रहा है। खर्चीली शादियां रुकनी चाहिए। ऐसे विवाह समारोहों में कई प्रकार की खाने की चीजें बना दी जाती हंै, जिससे भोजन की भी काफी बर्बादी होती है। सामूहिक विवाह खर्चीली शादियों का बेहतर विकल्प है। सामूहिक विवाह में कम खर्चे में कई जोड़ों का विवाह एक साथ हो जाता है। समाज के शिक्षित वर्ग को सादी और कम खर्चीली शादियों पर विचार करना चाहिए।

-डॉ. राजेन्द्र कुमावत, जयपुर

.........

कर्ज लेकर करते हैं खर्च

जो परिवार खर्च को वहन कर सकते हैं, उन पर खर्चीली शादियों का कोई असर नहीं होता है। मुश्किल यह है कि देखा देख , हीन भावना से बचने के लिए और सामाजिक दबाव में सामान्य परिवार भी कर्ज लेकर खर्च करते हैं।

-विनय बैद, बैंगलूरु

..............

रोजगार का सृजन

शादियों में बढ़ता खर्च विभिन्न प्रकार के रोजगारों का सृजन करता है। इससे बाजारों को फलने-फूलने का अवसर मिलता है। यह भी सच है कि जब एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति प्रतिस्पर्धा व सामाजिक दिखावे के चलते जब अपनी हैसियत से अधिक खर्च करता है तब कर्ज के चक्रव्यूह में फंस जाता है।

-शिवा सारस्वत, वनस्थली

.................

कर्ज का बोझ हाल ही में एक सर्वे में पाया गया था कि शादी के लिए लोन लेने वालों की हिस्सेदारी में काफी बढ़ोतरी हुई है। देखा देखी की होड़ में लोग आर्थिक तंगी के तले दबते जा रहे हैं। वे लोग जो धनी नहीं भी हंै, फिर भी उनको दिखाने के लिए महंगी शादी करनी पड़ती है।

-धीरेंद्र श्रीमाली, निम्बाहेड़ा

..........

पैसे की बर्बादी

खर्चीले विवाह समारोहों से सिर्फ पैसे की बर्बादी होती है। धनवान लोग यह परिपाटी शुरू करते हैं। उनमें तो यह खर्च उठाने में क्षमता होती है, परंतु आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग दिखावे के चक्कर में कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं।

-ललित महालकरी, इंदौर

...............

झूठी शान का प्रदर्शन

आजकल शादियों में फिजूलखर्ची बढ़ती चली जा रही है। शादी में खर्च किसी भी तरफ से हो, गलत है। अमीर लोगों को ऐसे बेलगाम खर्च से कोई फर्क नहीं पड़ता,लेकिन मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर इसकी मार पड़ती है। क्या ऐसे कार्यक्रम सादगी से नहीं होने चाहिए?

—डॉ.अजिता शर्मा, उदयपुर

.............

समारोह हो सादगीपूर्ण

आधुनिकता की चकाचौंध के कारण खर्चीले विवाह समारोह से परिवार कर्ज के तले दब रहा है। स्थानीय गांव या शहर में सस्ते भवन लेकर खर्च पर अंकुश लगाया जा सकता है। बेहतर तो यह है कि सादगीपूर्ण शादी समारोह करके एक दिन सभी अतिथियों को बुलाकर भोजन कर देना चाहिए।

-आनंद सिंह राजावत, देवली कला, ब्यावर