
आपकी बात, नौकरशाहों के राजनीतिक झुकाव का क्या असर होता है?
लोकतंत्र के लिए घातक
नौकरशाह सरकारी कार्यप्रणाली का आवश्यक व अनिवार्य घटक है। इस वर्ग से निष्पक्ष कार्य सम्पादन की अपेक्षा की जाती है। यदि यह वर्ग राजनीतिक प्रभाव से परे रहकर कार्य करता है, तो उसकी पारदर्शिता प्रशंसनीय व प्रेरक है। राजनीतिक चाटुकारिता या झुकाव बेहद ही अशोभनीय है, जो लोकतंत्र के लिए घातक और निंदनीय है। ब्यूरोक्रेट्स व्यवस्था को चुनौती देकर प्रशासनिक व्यवस्था को खोखला करने में लग जाते हैं। राजनीतिक चाटुकारिता द्वारा वे निहित स्वार्थों की पूर्ति में लगकर टिकट प्राप्त करके चुनाव लड़ते हैं, जो कि गलत परम्परा है। इससे निजात के लिए चुनाव आयोग को कुछ मानक तय करने चाहिए। 'कूलिंग पीरियड' जैसे नियम बनाए जा सकते हंै।
-विशम्भर थानवी, फलौदी, जोधपुर
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बढ़ जाती है मनमानी
एक प्रशासनिक अधिकारी का दायित्व होता है कि वह शासन में पारदर्शिता, जवाबदेही, तटस्थता के साथ कार्य करे, ताकि सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन ठीक तरह से हो। आजकल कुछ नौकरशाहों का झुकाव राजनीतिक पार्टियों खासकर सत्तारूढ़ दलों की तरफ हो रहा है, जिससे भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। इसके कारण सत्तारूढ़ दल मनमानी करते हैं। चुनाव में धांधली भी प्रशासनिक अधिकारियों के राजनीतिक झुकाव को प्रदर्शित करती है। यह लोकतंत्र के लिए घातक है।
-एकता शर्मा, गरियाबंद, छत्तीसगढ़
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नौकरशाहों को राजनीति में मौका दिया जाए
मंत्रियों को अपने विभागों के कार्यों का कोई अनुभव और ज्ञान नहीं होता है। ऐसी स्थिति में उन्हें विशेषज्ञ कर्मचारियों के इशारे पर ही अपने मंत्रालयों को चलाना होता है। यही वजह है कि नौकरशाही का प्रभाव बढ़ गया है। देश में नेता बनने के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता नहीं हैं। अनपढ़ व्यक्ति राजनीति कर सकता है। ऐसी स्थिति में अनुभवी और विषय-विशेष की अच्छी खासी पकड़ रखने वाले नौकरशाहों के राजनीतिक झुकाव से चुस्त, स्वस्थ और अनुशासित राजनीति की उम्मीद लगाई जा सकती है। उनके राजनीति में प्रवेश पर 'कूलिंग पीरियड' जैसे कोई बंधन नहीं लगाने चाहिए।
-नरेश कानूनगो, बेंगलूरु, कर्नाटक
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जरूरी है जवाबदेही
नौकरशाही के राजनीतिकरण' के कारण सिविल सेवाओं के कामकाज में गिरावट आई है। स्थानांतरण, पदस्थापन जैसे नियमित प्रशासनिक मामलों में नेताओं के शामिल होने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सांप्रदायिक दंगों जैसी कठिन परिस्थितियों में सख्त राजनीतिक तटस्थता वाले अधिकारियों की मांग रहती हैं। पक्षपातपूर्ण फैसलों से जान-माल का नुकसान हो सकता है। एक सिविल सेवक को ऐसी स्थिति में अपने निर्णयों के लिए जवाबदेह होना चाहिए।
-शरद गर्ग, दमोह, मध्य प्रदेश
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नौकरशाह और नेता
नौकरशाहों का राजनीति के प्रति झुकाव नेताओं के लिए मददगार होता है। यदि राजनेता और नौकरशाह मिल कर कार्य करें, तो समस्याओं का निराकरण हो सकता है।
-शारदा यादव, कोरबा, छत्तीसगढ़
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सीमा लांघना ठीक नहीं
जब देश की सेवा करने का जज्बा दिल में हो तो अपने अधिकार का प्रयोग करना जायज है, लेकिन उसकी सीमा लांघना उचित नहीं। नौकरशाहों के राजनीति में आने स आम नागरिकों का विश्वास सरकारी कर्मचारियों पर नहीं रहेगा।
-रजनी, श्रीगंगानगर
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सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति करने में बुराई नहीं
जिस राजनीतिक पार्टी की ओर नौकरशाह का झुकाव होता है, उसके प्रति उसका सॉफ्ट कॉर्नर होता है। कार्यकाल के दौरान यह ठीक नहीं लगता, लेकिन कोई नौकरशाह सेवानिवृत्ति के बाद किसी राजनीतिक पार्टी के बैनर तले काम करना चाहता है, तो बुराई नहीं है। नौकरशाह के अनुभव और ज्ञान का फायदा जनता को मिलता है।
-संजय माकोड़े बड़ोरा, बैतूल
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स्वार्थ सिद्धि के लिए नौकरशाहों का इस्तेमाल
नौकरशाह शक्ति और सत्ता के दुरुपयोग में नेताओं के साझीदार बन जाते हैं। यही वजह है कि नेता अपने मनमाफिक नौकरशाहों की नियुक्ति के लिए दबाव बनाए रखते हैं। हमारे यहां ऐसे नौकरशाहों की कमी नहीं है, जो अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए नेताओं के गलत कार्यों की भी वाहवाही करके उनके इशारों पर ही कार्य करते हंै। इसी वजह से सरकारी विभागों के प्रति जनता का विश्वास डगमगाता है।
-अजिता शर्मा, उदयपुर
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निजी स्वार्थ के लिए
नौकरशाहों का राजनीति की ओर झुकाव निजी स्वार्थ के लिए होता है। बड़े पदों पर रहते हुए रिटायरमेंट के बाद नौकरशाह फिर से रुतबा और ऐशोआराम चाहता है। इसीलिए वह राजनीति को चुनना चाहता है। नेताओं को नचाने में माहिर नौकरशाह अपने बचाव का तरीका भी जानते हैं।
-हरिप्रसाद चौरसिया, देवास, मध्यप्रदेश
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निष्पक्षता नहीं
नौकरशाह का यदि राजनीति की तरफ झुकाव है, तो नीति आधारित निष्पक्ष कार्य नहीं होंगे। प्रत्येक कार्य का आधार दल विशेष को रिझाना होगा, ताकि टिकट सुनिश्चित हो सके।
-सोफिल डांगी, जयपुर
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दब जाती है जनता की आवाज
नौकरशाहों के राजनीतिक झुकाव का लोकतंत्र पर काफी बुरा असर पड़ता है। जनता की आवाज दबा दी जाती है और तानाशाही होने लगती है। अपराधी प्रवृत्ति पनपती है।
-श्रीकृष्ण पचौरी, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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Published on:
03 Feb 2022 05:46 pm
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