
अंकिता जैन, 'ऐसी-वैसी औरत' उपन्यास की लेखिका
अंकिता जैन
कवियों को अपनी प्रेम कविताओं में स्त्री की कोमल हथेलियों और नाज़ुक कलाइयों के स्थान पर अब खुरदरी हथेलियों और मजबूत कलाइयों का भी वर्णन करना चाहिए। निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों में जहां औरतें ख़ुद ही झाड़ू-पोछा-बर्तन और सिलाई आदि करके घर के बजट और अर्थव्यवस्था को बनाए रखती हैं, उन्हें इतनी फुरसत नहीं होती कि वे बैठकर हाथों की सुंदरता के बारे में सोचें ही। आज तक कभी पार्लर की सीढ़ी ना चढऩे वाली मेरी मां ने भी कभी यह सिखाया ही नहीं था कि लड़कियों को अपने हाथों को नाज़ुक बनाना चाहिए। गांव-देहात और छोटे शहरों में सीमित आय में पलने-बढऩे वाली लड़कियां ऐसी ही होती हैं। एक उम्र के बाद जब शहरों में पढऩे-लिखने पहुंचती हैं, तब पार्लर की सीढ़ी ही पहली बार चढ़ती हैं। कुछ विवाह के बाद यदि पति थोड़ा भारी जेब वाला मिल जाए तो और बाकी शादी के बाद भी नहीं बदलतीं। अब जमाना बदल रहा है और लड़कियां ट्रेन-ऑटो-कैब ड्राइवर से लेकर फाइटर पायलट बन रही हैं।
मैकेनिक से लेकर कुली तक बन रही हैं, वहां इन स्त्रियों के पास क्या इतनी फुरसत होती होगी कि वे अपने हाथों की सुंदरता के बारे में सोचें? कुछ के पास समय नहीं होता होगा, कुछ के पास पैसा। लेकिन क्या उनके हाथों की सुंदरता बस नाज़ुकता या कोमलता में ही मानी जानी चाहिए? कड़क हथेलियों वाली कोई लड़की जिसकी हथेली और अंगुलियों के बीच कड़क-पपड़ीदार भट्ट पड़े हों, जिसके हाथ का एक तमाचा या कराटे का एक हाथ किसी को पड़े तो वह चित्त होकर गिरे, जो भारी वजन उठाने से पहले, कार की स्टेपनी बदलने से पहले यह ना सोचती हों कि नाखून टूट जाएगा, क्या ऐसी लड़कियों के हाथों को प्रेम कविताओं का बिम्ब नहीं होना चाहिए? क्या स्त्रियों से सिर्फ उनके कोमल और नाजुक हाथों के लिए ही प्रेम किया जाना चाहिए, जिनके बारे में कवि कहते हैं कि उसकी नर्म हथेलियों को हाथ में ले लिया तो सुबह हो गई, वह इतनी नाज़ुक है कि जोर से पकड़ लूं तो टूट न जाए ये डर लगता है। क्या ऐसी कल्पनाओं से बाहर निकलकर यथार्थ में खड़ी मजबूत स्त्री पर प्रेम कविताएं लिखी जा सकती हैं?
(लेखिका 'ऐसी-वैसी औरत' उपन्यास की राइटर हैं व सामाजिक और स्त्री मुद्दों पर लेखन करती हैं)
Published on:
08 Feb 2021 07:42 am
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