
प्रतीकात्मक चित्र
मुनि प्रमाण सागर
मित्रता की परिभाषा श्रीकृष्ण और सुदामा से सीखें। सवाल यह है कि मित्र किसे बनाना चाहिए? मित्र उसे बनाएं, जो आपको अच्छी प्रेरणा दे, जिसके साथ रहने से आपको अच्छी प्रेरणा मिले। जो आपको आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करे। मित्र वह ही अच्छा है, जो आपकी दुर्बलताओं को दूर करके आपकी अच्छाइयों को उभारने में सहायक बने। जो आपके संकट में काम आ सके। जिसके आचार-विचार अच्छे हों। ऐसे व्यक्ति को मित्र कभी न बनाएं, जो आपको गलत रास्ते पर ले जाए। जो केवल मौज-मस्ती के लिए आपके साथ जुड़ना चाहता है। वस्तुत: मित्र वही होता है, जो हर स्थिति में आपका साथ दे। जिससे आप मित्रता रखें, यह देखें कि उसके विचार कैसे हैं? उसका आचरण कैसा है? आचार-व्यवहार कैसा है? क्या वह आपको आगे बढ़ने के लिए उत्साहित करता है या हतोत्साहित करता है? आपकी दुर्बलता को दूर करने के लिए सहायक बनता है या आपको दुर्बलता की ओर धकेलता है। आपकी अच्छाइयों को उभारने में निमित्त बनता है या उन्हें नष्ट करने पर उतारू होता है? आप इन सभी बातों को देख करके, चिंतन-मनन करने के बाद ही किसी व्यक्ति से मैत्री करने की कोशिश करें। आप किसी भी व्यक्ति से मित्रता निभाएं, उसके सुख-दु:ख के साथी बनें। उसे आगे बढ़ाने में सहयोगी बनें, लेकिन कभी अपनी मित्रता के नाम पर आप अपने उसूलों को खण्डित न करें। जो व्यक्ति आपके माता-पिता और गुरुजन की आज्ञा की अवमानना करने को प्रेरित करे, वह मित्र कहलाने के लायक नहीं होता। उसका साथ छोड़ दें।
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