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आपकी बात: अब भी दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारने के मामले क्यों हो रहे हैं?

पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था। पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।

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Gyan Chand Patni

Feb 13, 2022

आपकी बात: अब भी दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारने के मामले क्यों हो रहे हैं?

आपकी बात: अब भी दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारने के मामले क्यों हो रहे हैं?

कार्रवाई जरूरी
दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। देश आजाद है। इसके बावजूद दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं। संविधान में सभी लोगों को अपनी परंपराएं निभाने की स्वतंत्रता है। ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई जरूरी है।
- दिनेश टिपरालिया, मेड़ता सिटी, नागौर
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शिक्षा और जागरूकता जरूरी
दुर्भाग्य से आज भी देश के ग्रामीण अंचल में जाति के नाम पर उत्पीड़न होता है। दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारने के मामले समाचार -पत्रों में पढऩे को मिलते ही रहते हंै। इसकी मुख्य वजह शिक्षा एवं जागरूकता का अभाव है। आज भी ग्रामीण भारत मे ऊंची जाति के सम्पन्न लोग अनुसूचित जाति - जनजाति के गरीब परिवारों का शोषण करते हंै। अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों में आपसी व्यवहार में भी छुआछूत किया जाता है। शिक्षा एवं जागरूकता ही समस्या का समाधान है।
-दिनेश गडपाल, सीहोर
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सोच में सुधार हो
समाज में अब भी उच्च वर्गों के कुछ लोगों में जातिवादी तथा सामंतवादी सोच जिंदा है। ये अपनी रूढि़वादी सोच से ऊपर नहीं उठे हैं। यही कारण है कि उन्हें किसी दलित का इस प्रकार घोड़ी पर चढऩा अथवा धूमधाम से विवाह करना अपनी शान के खिलाफ लगता है। हम सभी में एक जैसा खून है। निम्न सोच वाले लोगों को अपनी मानसिकता में सुधार करना चाहिए।
-एकता शर्मा, गरियाबंद, छत्तीसगढ़
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कठोर दंड जरूरी
आए दिन दलितों को घोड़ी से उतारने के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। जाति आधारित ऊंच-नीच की व्यवस्था ने भी इन मामलों को बढ़ाया है। जाति के आधार पर अपने आपको उच्च मानने वाले वर्गों को दलितों का घोड़ी पर बैठना भी गवारा नहीं है। दलितों पर अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं। धरातल पर कठोर और प्रभावी दंड व्यवस्था को लागू करने से ऐसी घटनाओं पर विराम लग सकता है ।
-कैलाश नंदवान, जोधपुर
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बंधुत्व की भावना का विकास जरूरी
दुनिया चांद और मंगल पर पहुंच बना चुकी है। इसके बावजूद हमारे समाज में इस तरह की निम्न स्तरीय सोच का अभी तक विद्यमान रहना चिंताजनक है। यह हमारे शिक्षा तंत्र की भी विफलता है। राजनीतिक दलों का स्वार्थ इसकी मुख्य वजह है। मामूली विवाद का वर्गों के टकराव में परिवर्तित होना इस तरह की घटनाओं को बढ़ावा देता है। हमें अगर समाज में व्याप्त इस बुराई को उखाड़ना है तो आने वाली पीढ़ी के जेहन में बंधुत्व व प्रेम भावना का विकास करना होगा।
-अजय जांगिड़, सोनड़ी
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ऊंच-नीच की ओछी मानसिकता
आज भी हमारे समाज में जाति आधारित ऊंच-नीच की मानसिकता विद्यमान है। कुछ जाति विशेष के लोग अपने आप को उच्च वर्ग का मानकर दलित वर्गो के साथ अनुचित व्यवहार करते हैं। दलितों का घोड़ी पर बैठना, धूमधाम से शादी करना भी अपमान लगता है। इसलिए आए दिन दलितों को घोड़ी से उतारा जा रहा है। समाज और सरकार को इस समस्या पर समस्या पर गंभीरता से ध्यान देना होगा।
-कैलाश पंवार, जोधपुर
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सभी को समान अधिकार
गांवों या शहरों में दलित दूल्हों को घोड़ी से उतारने के मामले अब भी हो रहे हैं। यह कुंठित मानसिकता का परिणाम है। भारत में रहने वाले सभी भारतीय हैं। इसमें दलित और सवर्ण का विभाजन क्यों होना चाहिए। गांवों में जो रूढि़वादी विचारधारा के लोग होते हैं, वे ही समाज को विभाजित करते हंै। भारत में सभी को समान अधिकार प्राप्त है। ।
-अरुण भट्ट, रावतभाटा
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दूषित मानसिकता
दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारने का कार्य दूषित मानसिकता का प्रतीक है। 21वीं सदी में भी इस तरह की घटनाएं निंदनीय और चिंताजनक है।
श्याम मनोहर व्यास, उदयपुर
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ऊंच-नीच की भावना का त्याग करें
दलित दूल्हों को घोड़ी पर देखना भी सवर्णों को गवारा नहीं है। दबंग उनको घोड़ी से उतार देते हैं और मारपीट करते हैं। सभी को ध्यान रखना होगा कि हम सब धरती के मेहमान हैं। एक दिन सब कुछ छोड़कर धरती से विदा लेना है। सवर्ण समाज में ऊंच नीच की भावना का त्याग करें।
-राहुल बनसोड, जबलपुर, मप्र
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एकजुट विरोध जरूरी
जब किसी दलित दूल्हे को घोड़ी से उतार कर अपमानित किया जाता है, तब इसका विरोध केवल दलित समाज करता है। सवर्ण समाज या तो अपराधियों के साथ आता है या फिर तटस्थ हो जाता है। जब पूरा समाज अपराधियों के खिलाफ नहीं खड़ा होगा, तब ही कार्रवाई होगी।
-शिव दयाल जाटव, वैर, भरतपुर