
आपकी बात, अब भी भारतीय परिवारों में पुत्र से ज़्यादा मोह क्यों है?
रूढि़वादी सोच का परिणाम
एक पुत्र ही वंश को आगे बढ़ा सकता है, बेटियां तो पराया धन होती है। ऐसी रूढि़वादी सोच के वशीभूत हो आज भी कई परिवार पुत्र जन्म पर ही जोर देते हैं। माहौल धीरे-धीरे बदल रहा है। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहां बेटियां नहीं पहुंची हों। आज पुत्री जन्म पर कई परिवारों में उत्सव भी मनाया जाता है। बेटियां भी अपने माता-पिता का नाम रोशन कर सकती हैं। पी.वी.सिंधु जैसी अनेक बेटियां हैं जो अपने परिवार की पहचान बन रही है। फिर पुत्र मोह क्यों? हमें अपनी पिछड़ी सोच से बाहर निकलना होगा।
-अजिता शर्मा, उदयपुर
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सोच में सुधार हो
पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए, बुढ़ापे की लाठी , श्राद्ध ,कर्मकांड, पिंड दान करने के लिए कुछ दंपती पुत्र को प्राथमिकता देते आए हैं। वे पुत्र और पुत्री में भेदभाव करते हैं। कभी-कभी तो पुत्र प्राप्ति की चाह इतनी बलवती होती है कि वे अस्पतालों में बच्चे चोरी करने लगते हैं। चोरी तो सभी तरह की बुरी है। लेकिन इस अनोखी चोरी के पीछे कहीं ना कहीं हमारा समाज और उसकी रूढि़वादी, पितृसत्तात्मक सोच भी जिम्मेदार है, जो दंपतियों पर पुत्रवती भव के आशीर्वादों की बौछारें करते हैं या फिर ताने सुनाते हैं। ऐसी में कुछ दंपती तीन चार पुत्रियां होने के बाद भी पुत्र प्राप्ति की चाह में संतानोत्पत्ति करते हैं। अवैध रूप से सोनोग्राफी करवाते हैं। क्या बेटियों के बिना वंश वृद्धि संभव है? फिर क्यों हमारा समाज उनके साथ यह भेदभाव करता है
-एकता शर्मा, जयपुर
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नहीं करें भेदभाव
पुरुष प्रधान भारत देश में पुत्र वंश चलाता है, स्वर्ग दिखाता है, बुढ़ापे का सहारा होता है, जैसी मान्यताओं से शिक्षित वर्ग भी अछूता नही है। इन बातों के चलते, आज भी हर मां बाप की चाहत होती है कि परिवार में एक पुत्र तो हो ही। सभी को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि सामाजिक जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए पुत्र-पुत्री दोनों ही समाज के आवश्यक अंग हैं। पुत्र-मोह के चलते गर्भ में पल रहे कन्या भ्रूण की हत्या तक करने के जो कदम उठाए जा रहे हैं, वे अनुचित हैं। ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में पुत्रों के विवाह के लिए, वंश को आगे बढ़ाने के लिए, बेटियां ही नहीं मिलेंगी। पुत्र-मोह त्याग बेटे-बेटी मे भेदभाव वाली भावनाओं को तजना होगा।
-नरेश कानूनगो, देवास, मध्यप्रदेश.
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नहीं बदली मानसिकता
हम बाहरी तौर पर तो आधुनिक हो गए हैं, लेकिन मानसिकता वही है। वंश वृद्धि के लिए पुत्र प्राप्ति की चाह बनी रहती हैं। हमें लगता है कि बेटी शादी करके अपने ससुराल जाएगी और ससुराल को संभाल लेगी। बेटियां आजीवन अपने माता-पिता के साथ नहीं रह सकती। उन्हें अपने पति और अपने ससुराल वालों के साथ रहना पड़ता है।
-रुचिका श्रीमाली, बालोतरा , बाडमेर
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बेटियों को भी मिल रहा है महत्त्व
भारतीय समाज में पुत्र से मोह होने का प्रमुख कारण सदियों से चली आ रही रुढि़वादी परम्परा है, परन्तु आज के शिक्षित समाज में अब बेटियों को भी बेटों की तरह ही महत्त्व दिया जाने लगा है। इसका सकारात्मक परिणाम यह हो रहा है कि बेटियां भी नई ऊंचाइयां छू रही हैं।
-संजय डागा हातोद
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पुत्र जन्म माना जाता है वरदान
सनातन संस्कृति में पुत्र को ज्यादा महत्व दिया गया है। आज भी पुत्री को पराया धन समझते हैं। पुत्र पैदा होना वरदान समझते हैं, क्योंकि पुत्र वंश का वारिस बनता है।
-रोशन पाटीदार, पारडा-सरोदा, डुंगरपुर
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बेटियां तो केवल चूल्हा संभालेंगी
यह धारणा सदियों से चली आ रही हैं कि बेटियां केवल रसोईघर तक ही सीमित हैं। इस कारण बेटे को अधिक तवज्जो और बेटी का हुनर छुपा रह जाता हैं।
- प्रियव्रत चारण, जोधपुर
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पराए घर चली जाती है पुत्री
भारतीय परिवारों में पुत्र मोह का सबसे बड़ा कारण पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वंश वृद्धि है। परिवार के सारे कार्य पिता के बाद पुत्र द्वारा ही संपन्न होना मान्य माना गया। फिर पुत्री को पराए घर जाना होता है और पुत्र अपने घर में रहता है।
-निर्मला वशिष्ठ, राजगढ़ अलवर
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बुढ़ापे का सहारा
भारतीय समाज में पुत्री को पराए घर की व पुत्र को बुढ़ापे का सहारा माना जाता है। शिक्षा के प्रसार से अब यह सोच काफी कम हो गई है। अब ज्यादातर परिवारों में दोनों को बराबर महत्व दिया जा रहा है।
-हनुमान पुरोहित, पाली
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पुत्री को मानते हैं पराया धन
अब भी भारतीय परिवारों में पुत्र के प्रति इसलिए ज्यादा मोह है क्योंकि लोग पुत्र को वंश चलाने वाला मानते हैं। पुत्री को पराए घर की अमानत मानते हैं।
-ओमप्रकाश श्रीवास्तव, उदयपुरा, मध्यप्रदेश
Published on:
09 Aug 2022 03:39 pm
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