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चुनौतियों के बीच कामकाजी स्त्रियां

हर कामकाजी स्त्री से यह अपेक्षा की जाती है कि वह दफ्तर से छुट्टी लेकर घर के दायित्व निभाएं। चाहे प्रश्न बड़ों की जरूरत का हो या परिवार के किसी और अन्य सदस्य का। इसके बावजूद उन्हें प्रशंसा नसीब नहीं होती।

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Sunil Sharma

Sep 03, 2018

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- ऋतु सारस्वत, समाजशास्त्री

पिछले दिनों महिला सशक्तीकरण की प्रतीक मानी जाने वाली पेप्सिको की सीईओ इंदिरा नुई ने पद छोड़ते वक्त जो पीड़ा व्यक्त की वह कमोबेश हर कामकाजी स्त्री की पीड़ा है। नुई का कहना था कि ‘मुझे रोज सुबह फैसला करना होता है कि आज मैं कौन-सा किरदार निभाऊंगी...मां, बीवी या बिजनेस वुमन का। ये बहुत मुश्किल है।’

दुनिया में कोई भी जगह हो, कार्यक्षेत्र का कोई भी स्वरूप हो, महिलाएं इसी मानसिक संत्रास को झेल रही हैं। बड़े ही स्पष्ट व कठोर शब्दों में कहा जा सकता है कि वे नौकरी ही न करें परन्तु यह कटाक्ष, सभ्यता के विकास को पीछे धकेल देता है।

देखा जाए तो विश्व की ‘आधी दुनिया’ अगर आत्मनिर्भरता का रास्ता चुनती है तो वह प्रत्यक्ष रूप से, उनके परिवार को आर्थिक सुदृढ़ीकरण देता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी महत्ती भूमिका निभाता है। लेकिन दुर्भाग्यवश हम उनके प्रति बहुत निष्ठुर हैं और इस निष्ठुरता की परिणति यह है कि महिलाएं नौकरी छोड़ रही हैं। हर कामकाजी स्त्री से यह अपेक्षा की जाती है कि वह दफ्तर से छुट्टी लेकर घर के दायित्व निभाएं चाहे प्रश्न बड़ों की जरूरत का हो या परिवार के किसी और अन्य सदस्य का। फिर भी उन्हें प्रशंसा नसीब नहीं होती और न ही अपने ही फुर्सत के पल।

ब्रिटेन में हुए एक सर्वे के मुताबिक, सुबह छह बजे बिस्तर छोडऩे के बाद से रात 11 बजे से पहले कामकाजी स्त्रियों को झपकी लेने तक की फुर्सत नहीं मिलती। सत्रह घंटे तक अनवरत कार्य करने से उनका शरीर बीमारियों का गढ़ बनने लगता है।

‘कुकिंग, केयरिंग एण्ड वोलटियरिंग: अनपेड वर्क अराउंड द वर्ल्ड’ नामक अध्ययन रिपोर्ट भारत और चीन सहित कुल 29 देशों में सर्वे के आधार पर तैयार की गई। रिपोर्ट में बताया गया कि वैसे तो पूरे विश्व में ही पुरुषों की तुलना में महिलाएं घरेलू कामकाज में अधिक समय बिताती हैं लेकिन भारत में तो महिलाएं प्रतिदिन पुरुषों से चार-पांच घंटे अधिक का समय घरेलू कामकाज में लगाती हैं।

स्वयं को हर मोर्चे पर सही सिद्ध करने की परीक्षा कामकाजी महिलाओं को भीतर ही भीतर तोड़ रही है। हर एक पल नया द्वंद्व उनके भीतर चलता रहता है। बच्चों को समय न दे पाने की ग्लानि इन्हें अवसादग्रस्त कर रही है। ऐसा नहीं है कि ऐसे हालात से कामकाजी स्त्रियों को मुक्ति नहीं मिल सकती। ऐसा तब ही संभव है जब परिवार के पुरुष सदस्य, भावनाओं से जुडक़र वास्तविक अर्थों में उनके सहयोगी बनें।